लैलूंगा अस्पताल में मानवता शर्मसार : सर्पदंश से मौत के बाद चीरघर बना ‘उगाही का अड्डा’, गमजदा आदिवासी परिवार से पोस्टमार्टम के नाम पर 1674 रुपये की खुली लूट…

रायगढ़। सरकारी अस्पतालों के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा ‘दीन-दुखियों की सेवा ही ईश्वर सेवा है’ का नारा लैलूंगा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पूरी तरह खोखला साबित हो चुका है। यहां संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार का ऐसा घिनौना चेहरा सामने आया है जिसने समूची व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। घर के मुखिया की सांप के काटने से हुई असमय मौत के मातम में डूबे एक गरीब आदिवासी परिवार के आंसुओं को पोंछने के बजाय, अस्पताल तंत्र ने उनकी बेबसी का फायदा उठाकर लाश के पोस्टमार्टम (शव-विच्छेदन) तक की बोली लगा दी।
मातम के बीच शुरू हुआ सौदेबाजी का खेल – घटना लैलूंगा थाना क्षेत्र के वनांचल ग्राम केर्राडहन की है। बुधवार रात को घुराउराम राठिया को किसी विषैले सर्प ने डस लिया। जहर फैलने से जब घुराउराम की हालत बिगड़ने लगी, तो बदहवास परिजन रात में ही उसे लेकर लैलूंगा अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों ने प्रारंभिक जांच के बाद ही घुराउराम को मृत घोषित कर दिया। घर का कमाने वाला सदस्य हमेशा के लिए आंखें मूंद चुका था और अस्पताल परिसर में परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था।
गुरुवार दोपहर जब कानूनी प्रक्रिया के तहत शव का पोस्टमार्टम कराने का वक्त आया, तो अस्पताल के कर्मचारियों ने संवेदना ताक पर रखकर अपनी जेबें भरने का खेल शुरू कर दिया।
‘छूट’ देकर लिए 600 रुपये नगद, 1074 का कराया ऑनलाइन पेमेंट – परिजनों का सीधा और गंभीर आरोप है कि पोस्टमार्टम गृह में पदस्थ अस्पताल के कर्मचारी ने प्रक्रिया शुरू करने के एवज में बेधड़क 1,000 रुपये की मांग रख दी। रोते-बिलखते परिजनों ने जब आर्थिक तंगी का हवाला देकर गिड़गिड़ाते हुए पैसे कम करने की गुहार लगाई, तो कथित कर्मचारी ने ‘रहम’ दिखाते हुए 600 रुपये नगद झटक लिए।
उगाही यहीं नहीं थमी। कर्मचारी ने आगे हुक्म सुनाया कि पोस्टमार्टम के काम में आने वाला जरूरी सामान बाहर से खरीदकर लाओ। जब गमजदा परिजनों ने कहा कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि क्या सामग्री लगती है, तो कर्मचारी खुद किसी गाइड की तरह उन्हें लेकर अस्पताल के बाहर स्थित मेडिकल स्टोर पहुंचा। वहां उसने अपनी मर्जी से सामान निकलवाया और लाचार परिजनों से 1,074 रुपये का ऑनलाइन भुगतान (UPI/Online) करवाया।
यानी एक ओर परिजन अपने मृतक का मुंह देखकर कलेजा पीट रहे थे, वहीं दूसरी ओर अस्पताल के नुमाइंदे ने योजनाबद्ध तरीके से कुल 1,674 रुपये ऐंठ लिए।
सिस्टम के मुंह पर तमाचा : जब सब मुफ्त, तो फिर यह लूट क्यों? – यह घटना छत्तीसगढ़ सरकार की उस ‘मुफ्त और सुलभ स्वास्थ्य सेवा’ के दावों के गाल पर करारा तमाचा है, जिसका ढिंढोरा हर मंच से पीटा जाता है। नियमानुसार:
- किसी भी सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम की पूरी प्रक्रिया शत-प्रतिशत निःशुल्क होती है।
- चीरफाड़ के लिए लगने वाले सर्जिकल ब्लेड, धागे, कॉटन, फॉर्मेलिन या अन्य आवश्यक संसाधन अस्पताल प्रबंधन को सरकारी बजट से उपलब्ध कराने होते हैं।
- किसी भी मृतक के परिजन से एक रुपया भी लेना कानूनन अपराध और दंडनीय रिश्वतखोरी की श्रेणी में आता है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या लैलूंगा अस्पताल में पोस्टमार्टम के नाम पर यह अवैध वसूली का कोई पुराना सिंडिकेट चल रहा है? क्या डॉक्टरों और उच्च अधिकारियों की नाक के नीचे यह गोरखधंधा लंबे समय से फल-फूल रहा है, जहां हर लाचार ग्रामीण को इसी तरह निचोड़ा जाता है?
जांच के नाम पर लीपापोती होगी या नपेगा जिम्मेदार? – गरीब और सीधे-साधे वनांचल के ग्रामीणों को सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों में किस तरह प्रताड़ित किया जाता है, केर्राडहन का यह मामला इसका जीवंत प्रमाण है। 1,074 रुपये के ऑनलाइन ट्रांजेक्शन का डिजिटल रिकॉर्ड परिजनों के पास मौजूद है, जो इस अवैध वसूली का सबसे बड़ा पुख्ता सबूत है।
अब क्षेत्र की जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजरें स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या प्रशासन केवल रस्मी ‘जांच समिति’ बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देगा, या फिर लाशों पर दलाली करने वाले इस संवेदनहीन कर्मचारी और उसके पीछे खड़े संरक्षकों पर सख्त कानूनी व दंडात्मक कार्रवाई कर नजीर पेश करेगा?




