चक्रधर समारोह की तीसरी शाम : लोकधुनों, शास्त्रीय गरिमा और कथक के विविध आयामों से गुलजार हुआ ऐतिहासिक रामलीला मैदान…

रायगढ़। कला, साहित्य एवं संगीत की पावन धरा रायगढ़ में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त 41वें चक्रधर समारोह-2026 की तीसरी सांस्कृतिक संध्या कला प्रेमियों के लिए अविस्मरणीय बन गई। ऐतिहासिक रामलीला मैदान में सुर, लय, ताल और भाव-भंगिमाओं का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिला कि दर्शक देर रात तक मंत्रमुग्ध होकर प्रस्तुतियों का आनंद लेते रहे। संध्या का फलक छत्तीसगढ़ी लोकपरंपरा से लेकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य की उच्च परंपराओं तक विस्तृत रहा।
नीलेश जोगी म्यूजिकल ग्रुप : लोकधुनों और सुगम संगीत से हुआ संगीतमय आगाज – तीसरी संध्या का शुभारंभ नीलेश जोगी म्यूजिकल ग्रुप के सुमधुर संगीत से हुआ। नीलेश जोगी एवं उनके साथी कलाकारों ने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की सोंधी खुशबू के साथ कार्यक्रम की नींव रखी। गायकी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के परस्पर मेल ने पूरे परिसर में मिठास घोल दी। कलाकारों ने छत्तीसगढ़ी लोकधुनों के साथ-साथ कुछ अत्यंत लोकप्रिय बॉलीवुड गीतों का भी सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया। दर्शक दीर्घा में उपस्थित श्रोता लगातार तालियों की थाप से कलाकारों का उत्साहवर्धन करते नजर आए।
डॉ. दीपिका सरकार : भरतनाट्यम में दिखी दक्षिण की शास्त्रीय परंपरा और भाव-सौंदर्य – दीपिका नृत्यालय की संस्थापिका एवं विदुषी नृत्यांगना डॉ. दीपिका सरकार ने मंच पर भरतनाट्यम की गरिमामयी प्रस्तुति दी। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से वर्ष 2017 में भरतनाट्यम में डॉक्टरेट (पीएच.डी.) की उपाधि प्राप्त डॉ. सरकार ने भाव, लय और ताल का अत्यंत परिपक्व प्रदर्शन किया।
उनकी प्रस्तुति का विवरण :
- गणेश कौतुवम : कार्यक्रम का आरंभ विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश की वंदना से हुआ, जिसमें भरतनाट्यम की पारंपरिक मुद्राओं एवं शारीरिक विन्यास से देव-आराधना की गई।
- देवी स्तुति : इसके उपरांत आदिशक्ति भगवती के विभिन्न शक्ति-स्वरूपों, उनकी महिमा और संहारक-पालक रूपों को भावपूर्ण मुद्राओं के माध्यम से मंच पर उतारा गया।
- स्वागतम् कृष्ण : अंतिम प्रस्तुति में नटखट बालकृष्ण के दिव्य स्वरूप और उनकी लीलाओं का सजीव चित्रण कर उन्होंने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
उल्लेखनीय है कि कटक महोत्सव में ‘नृत्य शिरोमणि सम्मान-2023’, सिंगापुर में ‘शौर्य प्रवाह विभूति-2019’, तथा भारत संस्कृति सम्मान सहित कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त डॉ. सरकार के प्रशिक्षित शिष्य सिंगापुर, दुबई, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों में भारतीय संस्कृति का मान बढ़ा चुके हैं।
जयात्रा दवे : ढाई वर्ष की आयु से शुरू हुई कथक-साधना की दिखी परिपक्व झलक – मध्य प्रदेश के इंदौर से पधारीं युवा कथक नृत्यांगना जयात्रा दवे ने अपनी तकनीकी कुशलता और सधे हुए पद-संचालन से सबको चकित कर दिया। मात्र ढाई वर्ष की आयु से नृत्य सीख रहीं जयात्रा, नादयोग गुरुकुल में गुरु डॉ. रागिनी मक्कड़ के मार्गदर्शन में अपनी कला को तराश रही हैं।
स्वीडन के माल्मो में आयोजित इंटरनेशनल म्यूज़िक कॉन्फ्रेंस तथा चीन में आयोजित 12वें इंटरनेशनल फोक आर्ट्स फेस्टिवल में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकीं जयात्रा ने कथक की पारंपरिक शुद्धता, द्रुत लयकारी, चक्करों और सूक्ष्म नयन-अभिप्रायों से मंच को आलोकित कर दिया।
विभूति शर्मा : रायगढ़ की अपनी प्रतिभा ने मोहा सबका मन – रायगढ़ की स्थानीय प्रतिभा और राष्ट्रीय स्तर की कथक नृत्यांगना विभूति शर्मा की प्रस्तुति इस शाम का मुख्य आकर्षण रही। चक्रधर संगीत महाविद्यालय से छह वर्षीय डिप्लोमा पूरा करने के बाद वर्तमान में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से कथक में बी.ए. कर रहीं विभूति ने अपनी मिट्टी के संस्कार और शास्त्रीय समर्पण को मंच पर साकार किया।
विभूति वर्ष 2020 की ऑल इंडिया ऑनलाइन नेशनल डांस प्रतियोगिता में प्रथम, 12वें कटक महोत्सव (2021) में प्रथम तथा 2024 के खजुराहो नृत्य महोत्सव में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड कार्यक्रम की प्रतिभागी रह चुकी हैं। उनकी भावपूर्ण लयबद्धता और आत्मविश्वास से भरी प्रस्तुति ने स्थानीय दर्शकों से विशेष प्रशंसा व तालियां बटोरीं।
भूपेन्द्र साहू व ‘रंग सरोवर’ : माटी की महक और लोकचेतना का जीवंत दर्शन – गरियाबंद के वरिष्ठ रंगकर्मी भूपेन्द्र साहू ने अपनी टीम के साथ छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के बहुरंगी स्वरूप को प्रभावशाली अंदाज में पेश किया। मध्यप्रदेश रंगमंडल (भारत भवन, भोपाल) से प्रशिक्षित और वर्ष 2006 से ‘रंग सरोवर’ संस्था के माध्यम से अब तक लगभग 1000 मंचीय प्रस्तुतियां दे चुके भूपेन्द्र साहू ने दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़ा।
मंचन के प्रमुख अंश :
- नारी महिमा व राज्य वंदना : ‘हमन नारी आवन वो, सबके महतारी आवन ग’ के सशक्त स्वर और राज्य गीत ‘अरपा पैरी के धार’ से सांस्कृतिक चेतना जगाई।
- लोकपरंपरा व पर्व : भोजली गीत, सुवा गीत व नृत्य के साथ-साथ बाबा गुरु घासीदास के शांति व समता के संदेश को पंथी नृत्य के माध्यम से तीव्र ऊर्जा के साथ प्रस्तुत किया गया।
- पारंपरिक विधाएं : कर्मा और ददरिया की प्रस्तुतियों ने ग्रामीण जीवन की सहजता को जीवंत किया। साथ ही श्रीराम स्तुति से वातावरण भक्तिमय हो गया।
प्रस्तुति के उपरांत रायगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशिमोहन सिंह एवं सुश्री उर्वशी देवी ने भूपेन्द्र साहू को स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया।
डॉ. यास्मीन सिंह : महाराजा चक्रधर सिंह की ऐतिहासिक रचना ‘चंद्रबदनी’ का सजीव रूपांतरण – प्रख्यात नृत्यांगना डॉ. यास्मीन सिंह ने कथक के माध्यम से रायगढ़ घराने की अनूठी धरोहर को मंच पर पुनर्जीवित किया। इंदौर के गुरु मधुकर जगताप, लखनऊ घराने के पंडित अर्जुन मिश्रा और रायगढ़ घराने की विशेषज्ञ प्रो. मांडवी सिंह से दीक्षित डॉ. यास्मीन की प्रस्तुति शास्त्रीय गहराई से परिपूर्ण रही।
- दिव्य कृष्ण व गोविंदा गोपाला : कार्यक्रम का आरंभ भक्ति-भाव से सराबोर भगवान कृष्ण की स्तुति से हुआ।
- झूला गीत व द्रौपदी प्रसंग : राधा-कृष्ण के प्रेमरंग और प्रकृति के सौंदर्य को दर्शाने के बाद उन्होंने महाभारत के द्रौपदी प्रसंग को उठाया, जिसमें द्रौपदी और श्रीकृष्ण के मध्य सखा-सखी के अटूट विश्वास का अत्यंत मार्मिक भावाभिनय पेश किया।
- चंद्रबदनी : प्रस्तुति का चरमोत्कर्ष महाराजा चक्रधर सिंह की प्रसिद्ध रचना ‘चंद्रबदनी, मृगलोचनी, दामिनी, दुति गोरी, अलबेली नवल नार, करति चित की चोरी…’ रहा। इस पर किए गए नृत्य-अभिनय ने रायगढ़ घराने की नजाकत और शब्द-अर्थ के तादात्म्य को जीवंत कर दिया।
मऊमाला नायक एवं दल : दिल्ली के कलाकारों ने धमार ताल की कठिन बंदिशों से बांधा समां – सांस्कृतिक संध्या का भव्य समापन दिल्ली की विख्यात कथक नृत्यांगना मऊमाला नायक और उनके दल के तकनीकी कथक प्रदर्शन के साथ हुआ। उनके साथ नीतू कुमारी, निशा रॉय, अर्चना शर्मा और विदुषी सिंह ने मंच साझा किया।
- गणेश वंदना व तुलसी-रत्नावली: विघ्नहर्ता की अर्चना के बाद दल ने महाकवि तुलसीदास और उनकी पत्नी रत्नावली के प्रेरक आख्यान को भाव-अभिनय के जरिए प्रस्तुत किया।
- चतुरंग: राग मालगुंजी और तीनताल में निबद्ध ‘चतुरंग’ की प्रस्तुति हुई, जिसमें सरगम, साहित्य, तराना और पखावज के बोलों का अद्भुत तालमेल देखने को मिला।
- धमार का तकनीकी वैभव: कार्यक्रम के अंतिम चरण में 14 मात्राओं की धमार ताल में कथक के क्लिष्ट तकनीकी पक्ष का प्रदर्शन किया गया। कलाकारों ने उठान, तिपल्ली आमद, चक्रदार तोड़ा, सादा परन, तिहाई और बांट जैसी शास्त्रीय बंदिशों को तीव्र पद-संचालन और अचूक लयकारी के साथ प्रस्तुत किया।
समारोह की तीसरी संध्या शास्त्रीय गरिमा, समृद्ध परंपरा और लोकधुनों के बेजोड़ समागम के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई।
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