रायपुर

टाइमलाइन पर अस्सी का ‘नॉस्टैल्जिया’ : जनता मांग रही रोजगार और सड़क, हुक्मरान परोस रहे ब्लैक एंड व्हाइट सादगी…

रायपुर। आम नागरिक इन दिनों इस भारी भ्रम में जी रहा है कि वह इक्कीसवीं सदी के डिजिटल युग का बाशिंदा है या किसी पुराने श्वेत-श्याम टीवी के पर्दे पर अटका हुआ बेबस दर्शक। मतदाता सुबह उठता है तो सोचता है कि आज शायद सड़कों के गड्ढे भर गए होंगे, अस्पताल में दवा मिल जाएगी, नलों में पानी आएगा और बेरोजगार युवाओं के लिए किसी नई भर्ती की विज्ञप्ति जारी होगी। लेकिन जैसे ही वह मोबाइल की स्क्रीन खोलता है, राजनेताओं और हुक्मरानों की अस्सी के दशक वाली ‘विंटेज लीला’ सामने आ जाती है।

कहीं खादी की बेलबॉटम पतलून और आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाए पुरानी सादगी का पाठ पढ़ाया जा रहा है, तो कहीं भारी-भरकम डायल वाले पुराने टेलीफोन का चोंगा कान से लगाकर यह साबित किया जा रहा है कि चार दशक पहले फाइलों का निस्तारण कितनी निष्ठा से होता था। दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो जनता बिजली, सड़क और पानी की मांग लेकर नहीं, बल्कि दरबार में यह गुहार लगाने आई हो – ‘हुजूर, जब आपके सिर पर घने बाल थे, तब आप कितने आकर्षक दिखते थे, तनिक वह तस्वीर दिखाइए!’

अतीत की सुरक्षित पनाहगाह : न गड्ढों का हिसाब, न महंगाई का रोना – सियासतदानों में अचानक जागा यह ‘टाइम-ट्रैवल’ का शौक अनायास नहीं, बल्कि सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। वर्तमान के धरातल पर खड़े होकर जनता की आंखों में आंखें डालना आसान नहीं है। आज के चौखटे में आएंगे तो जनता पूछ बैठेगी – स्मार्ट सिटी के मद में आई भारी-भरकम राशि किन गड्ढों में समा गई? युवा पूछेंगे कि वर्षों से अटकी भर्तियों के परिणाम कब जारी होंगे? व्यापारी पूछेंगे कि बाजार में मंदी का आलम क्यों है?

इन तमाम असहज और सीधे सवालों का सबसे सुलभ व आजमाया हुआ नुस्खा है – अतीत के तहखाने में छुप जाना। पुरानी तस्वीर निकालिए, उस पर स्मृतियों की चाशनी लपेटिए और सोशल मीडिया पर साझा कर दीजिए। पुरानी तस्वीरों की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि उनमें न तो उधड़ी सड़कों के गड्ढे दिखते हैं, न अस्पतालों में स्ट्रेचर का अभाव, न घूसखोरी की पर्ची और न ही महंगाई की मार। वहां केवल एक भावुक सन्नाटा होता है, जिसकी आड़ में वर्तमान की प्रशासनिक और नीतिगत विफलताओं को सुगमता से छिपाया जा सकता है।

साहब बहादुर की रेट्रो क्रांति : कार्यप्रणाली बैलगाड़ी जैसी, प्रोफाइल अस्सी के दशक की – ​स्मृतियों के इस संक्रामक खुमार में प्रशासनिक तंत्र भी पीछे नहीं है। आम नागरिक कलेक्ट्रेट और विभिन्न मंत्रालयों के चक्कर काट-काटकर हलकान है कि कोई एक फाइल आगे बढ़ जाए। फाइलें एक पटल से दूसरे पटल तक पहुंचने में कछुए की गति को भी मात दे रही हैं, लेकिन साहब अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठकर इंटरनेट पर चालीस वर्ष पुराना संस्मरण लिख रहे हैं कि कैसे वे कभी साइकिल से निरीक्षण पर निकला करते थे।

नागरिक ऑनलाइन सेवाओं, एकल खिड़की प्रणाली (सिंगल विंडो सिस्टम) और त्वरित समाधान की उम्मीद लगाए बैठा है; परंतु तंत्र का मौन संदेश स्पष्ट जान पड़ता है -‘काम की रफ्तार भले अस्सी के दशक की बैलगाड़ी जैसी रहे, हमारी प्रोफाइल पूरी तरह से रेट्रो और कलात्मक दिखनी चाहिए।’ जनता यह जानने में तनिक भी रुचि नहीं रखती कि साहब जवानी के दिनों में किस अभिनेता जैसे दिखते थे; जनता केवल यह चाहती है कि आज उनके दफ्तर के चक्कर काटते-काटते नागरिक की उम्र न बीत जाए।

मुद्दों की बलिहारी, विंटेज का कारोबार – विश्व जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सुरक्षा, सेमीकंडक्टर तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर मंथन कर रहा है, तब हमारे यहां का विमर्श दूरदर्शन के पुराने दौर की जुगाली करने में ही इतिश्री मान रहा है।

​आगामी चुनावों की आहट पाते ही नीति-नियंताओं की पूरी ऊर्जा पुराने अलबमों की धूल झाड़ने में खप रही है। जनता के ज्वलंत मुद्दों को नेपथ्य में धकेलकर एक भावनात्मक आख्यान गढ़ा जा रहा है कि ‘हम कितने सीधे थे, हमारा जीवन कितना संघर्षपूर्ण था।’ हुक्मरान यह भूल जाते हैं कि अतीत का संघर्ष उनका व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है, लेकिन आज की जनता का संघर्ष व्यवस्था की अक्षमता की देन है। पुरानी सादगी का यह प्रदर्शन दरअसल वर्तमान की विलासिता और लचर व्यवस्था पर पर्दा डालने का सतही प्रयास मात्र है।

श्वेत-श्याम यादों से पेट नहीं भरता – ​मतदाता को यह समझना होगा कि 5G के दौर में चार दशक पुरानी मानसिकता से भविष्य नहीं संवर सकता। अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा उपकरण चाहिए; वर्ष 1985 का लकड़ी का स्टूल दिखाकर मरीज की पीड़ा दूर नहीं की जा सकती। युवाओं को अत्याधुनिक उद्योग और रोजगार चाहिए; वे राजनेताओं की पुरानी तस्वीरों की प्रशस्ति गाकर अपनी आजीविका नहीं चला सकते।

​हुक्मरानों को भी यह भ्रम त्याग देना चाहिए कि जनता स्मृतियों के सम्मोहन में अपने भविष्य की उपेक्षा कर देगी। तस्वीरें चाहे अस्सी के दशक की हों या नब्बे की, वे केवल यह प्रमाणित करती हैं कि आप बीते कल में कैसे थे; उनसे यह कतई सिद्ध नहीं होता कि आने वाले कल के लिए आपके पास कोई ठोस दृष्टि है। स्मृतियों के अलबम बंद करके धरातल पर उतरना ही होगा, अन्यथा जिस दिन जनता ने अपने मताधिकार का पैमाना बदला, उस दिन सियासत के सारे विंटेज रंग एक ही झटके में फीके पड़ जाएंगे।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!