लैलूंगा : झगरपुर के कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में ₹20 लाख की मंजूरी के बाद भी गरीब पालकों से ₹500 की वसूली: लीपापोती की खुली पोल, SDM का बड़ा खुलासा…

- पोर्टल के ‘क्लीन चिट’ वाले फर्जी बयान को SDM ने नकारा; बोले– “वसूली गलत, पैसा वापस करने का दिया आदेश”, BEO ने साधी चुप्पी…
रायगढ़। कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय (झगरपुर) में सरकारी फंड के रहते गरीब पालकों से मरम्मत के नाम पर 500-500 रुपये और श्रमदान कराने के मामले ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। मामले को दबाने और “अफवाह व तथ्यहीन” बताकर अधिकारियों के नाम से मनगढ़ंत बयान प्रकाशित करने की साजिश खुद प्रशासनिक जांच और ऑन-रिकॉर्ड बयानों के सामने ध्वस्त हो गई है।

रजिस्टर के पन्नों ने उगला सच : बाकायदा प्रस्ताव पारित कर हुई वसूली – एक तरफ जहां मामले को पूरी तरह झूठा साबित करने की कोशिश की जा रही थी, वहीं शाला प्रबंधन एवं विकास समिति के आधिकारिक बैठक रजिस्टर ने सारा कच्चा चिट्ठा खोल दिया है:
- 27 अगस्त 2026 की बैठक : रजिस्टर में साफ दर्ज है कि बरसात में स्कूल भवन में पानी टपकने और दो कक्षाओं को एक साथ बैठाने की मजबूरी के चलते पुरानी बिल्डिंग की मरम्मत के लिए पालकों से ₹500 और एक दिन का श्रमदान लेने का निर्णय हुआ।
- 8 सितंबर 2026 की बैठक : एजेंडा क्रमांक-1 “शाला भवन की मरम्मत हेतु जनसहयोग” के तहत पूर्व निर्धारित ₹500 और श्रमदान के फैसले को दोहराया गया और 9 सितंबर से काम शुरू करने की रूपरेखा तय हुई। इस पर समिति पदाधिकारियों और शिक्षकों के बकायदा दस्तखत मौजूद हैं।
SDM राकेश वर्मा का ऑन-रिकॉर्ड खुलासा : “मैंने नहीं दिया फर्जी बयान, वसूली गलत; पैसा लौटाएं” – स्थानीय स्तर पर प्रचारित उस दावे की हवा खुद अनुविभागीय दंडाधिकारी (SDM) लैलूंगा राकेश वर्मा ने निकाल दी, जिसमें उनके हवाले से मामले को “अफवाह और तथ्यहीन” बताया गया था। ऑन-रिकॉर्ड बातचीत में एसडीएम ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा :
“मैंने पोर्टल को ऐसा कोई बयान नहीं दिया है कि यह मामला पूरी तरह अफवाह है। मौके की जांच में पालकों द्वारा ₹500 लेने का निर्णय सामने आया है। भले ही पालकों ने इसे स्वेच्छा से लिया गया फैसला बताया हो, लेकिन किसी भी शासकीय विद्यालय में इस प्रकार की वसूली नियमानुसार गलत है। मैंने साफ तौर पर निर्देश दिए हैं कि पालकों से लिया गया पैसा तत्काल वापस किया जाए।”
फाइलों में दबा 20 लाख का DMF फंड, 6 महीने से टपक रही बालिकाओं के सिर पर छत – जनपद पंचायत लैलूंगा और खनिज न्यास मद (DMF) से कस्तूरबा गांधी झगरपुर के जीर्णोद्धार के लिए ₹20 लाख की प्रशासकीय स्वीकृति महीनों पहले (मार्च 2026) मिल चुकी है।
- सवाल यह उठता है कि जब शासन से ₹20 लाख का भारी-भरकम बजट मंजूर था, तो 6 महीने बीत जाने के बाद भी तकनीकी पेच के नाम पर काम क्यों अटका रहा?
- बालिकाओं को रिसती छतों के नीचे बिठाने और गरीब आदिवासी पालकों से चंदा मांगने की नौबत प्रशासनिक लापरवाही नहीं तो और क्या है?
कटघरे में शिक्षा तंत्र : फोन से बचते नजर आए BEO – शाला समिति के लिखित दस्तावेज और एसडीएम द्वारा पैसे वापस कराने के कड़े आदेश के बाद शिक्षा विभाग के जिम्मेदार बैकफुट पर हैं। इस पूरे मामले में जब विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) रवि शंकर सारथी का पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना जरूरी नहीं समझा।
सीधे और तीखे सवाल :
- जब ₹20 लाख की राशि स्वीकृत थी, तो किस नियम के तहत विद्यालय में पालकों से चंदा उगाही और श्रमदान का प्रस्ताव पास कराया गया?
- प्रशासनिक जांच में वसूली प्रमाणित होने और पैसे लौटाने के आदेश के बाद भी फर्जी बयानों के जरिए मामले को दबाने का खेल किसके इशारे पर रचा गया?
- टपकती छत और 6 महीने से लटकी फाइलों के लिए जिम्मेदार शिक्षा विभाग व एजेंसी पर क्या सख्त कार्रवाई होगी?
पूर्व में प्रकाशित खबर :
अगले भाग में खुलेंगे कइयों की कलाई…




