नेताओं के रसूख के आगे खाकी नतमस्तक? पत्थलगांव में 100 साल पुराना कब्जा हड़पने का खुला खेल!…

भाग 2
जशपुर। जिले के पत्थलगांव में सत्ता और रसूख की हनक का एक ऐसा हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता और राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ‘कानून सबके लिए बराबर है’ का दावा उस वक्त खोखला साबित होता दिखा जब 100 साल पुराने पुश्तैनी कब्जे को कागजी जादूगरी और राजनीतिक धौंस के दम पर रातों-रात हड़प लिया गया।
स्थानीय स्तर पर थानों के चक्कर काटकर थक चुके पीड़ित रवींद्र गुप्ता ने अब पूरे मामले की शिकायत सीधे शासन के ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज कराई है। यह कदम स्थानीय पुलिस प्रशासन की ढुलमुल कार्यशैली और नेताओं के आगे खाकी की खामोशी पर गहरा तंज कसता है।
कागजों की बाजीगरी: रातों-रात बदल दिया खसरा नंबर– शिकायतकर्ता के अनुसार, पत्थलगांव क्षेत्र स्थित एक सरकारी प्लॉट पर उनके परिवार का करीब 100 वर्षों से लगातार शांतिपूर्ण कब्जा चला आ रहा था। लेकिन सत्ताधारी रसूख का ऐसा खेल चला कि नियमों और दस्तावेजों की धज्जियां उड़ा दी गईं:
- प्लॉट का मूल खसरा नंबर 1160 था।
- प्रशासनिक मिलीभगत से इसे कागजों में रातों-रात बदलकर 1159/1 दर्ज कर दिया गया।
- खसरा बदलते ही 100 साल पुराने कानूनी और पारंपरिक वजूद को कागजों से पूरी तरह गायब कर दिया गया।
दबंगई से कब्जा और तुरंत सौदेबाजी – शिकायत में सीधे तौर पर बीजेपी नेता अवधेश गुप्ता और श्याम नारायण गुप्ता पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं:
- आरोप है कि लगभग 5 से 6 महीने पहले दोनों नेताओं ने मिलकर इस जमीन पर जबरन कब्जा जमा लिया।
- कब्जा करने के तुरंत बाद भू-माफियाओं के अंदाज में आनन-फानन में उस जमीन का आगे सौदा कर दिया गया और उसे बेच दिया गया।
पुराने विवाद, गालियां और बेबस पुलिस – यह पहला मौका नहीं है जब नेताजी का नाम किसी विवाद में उछला हो। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि नेताजी के गाली-गलौज, धमकियों और विवादों के वीडियो पहले भी वायरल होकर सुर्खियां बटोर चुके हैं। इसके बावजूद हर बार पुलिसिया कार्रवाई रसूखदारों के आगे ठिठक कर रह जाती है।
पीड़ितों का साफ कहना है कि कानून के हाथ केवल आम जनता तक ही पहुंच पाते हैं; जैसे ही मामला सत्ता से जुड़े नेताओं का आता है, खाकी की सख्ती खामोशी में बदल जाती है।
डिजिटल गुहार: क्या जागेगा शासन? – स्थानीय स्तर पर लगातार अनदेखी और सांठगांठ के डर से पीड़ित ने थाने के चक्कर काटने के बजाय मामले को सीधे ऑनलाइन पोर्टल पर भेजा है, ताकि डिजिटल रिकॉर्ड होने के कारण इसे किसी टेबल के नीचे दबाया न जा सके।
अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इस उच्चस्तरीय ऑनलाइन शिकायत के बाद जिला प्रशासन और शासन की नींद खुलेगी और पीड़ित को न्याय मिलेगा, या फिर यह मामला भी ‘जांच जारी है’ के सरकारी ठंडे बस्ते में दफन हो जाएगा?
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