शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा : दुर्ग संभाग आयुक्त कार्यालय की लापरवाही, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
रायपुर/बालोद। छत्तीसगढ़ के दुर्ग संभाग में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। स्थानीय निवासियों द्वारा लिखित शिकायतें दर्ज कराने के बावजूद प्रशासनिक अधिकारी केवल औपचारिकताओं तक सीमित रहते हैं, जिससे आम जनता में असंतोष व्याप्त है। खासकर बालोद जिले के डौंडी तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत कुसुमकसा क्षेत्र में यह समस्या चरम पर है, जहां शिकायतों पर त्वरित कार्यवाही का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यह न केवल भूमि हड़पने वालों को प्रोत्साहन दे रहा है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना भी कर रहा है। आखिर क्यों दुर्ग संभाग आयुक्त कार्यालय महज पत्राचार तक सिमट गया है? इस खबर में हम विस्तार से इस मुद्दे की पड़ताल करेंगे।

दुर्ग संभाग के आयुक्त कार्यालय ने शासकीय संपत्ति पर अवैध कब्जे की शिकायतों को गंभीरता से लेने के बजाय खानापूर्ति का रवैया अपना रखा है। पिछले वर्ष दर्ज की गई एक प्रमुख शिकायत पर आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि आयुक्त कार्यालय केवल पत्रों के आदान-प्रदान तक ही सक्षम रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर अवैध निर्माण और कब्जे तेजी से बढ़ रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी से जुड़े गुमनाम सूत्र ने दावा किया है कि उच्च अधिकारियों को ‘महात्मा गांधी की तस्वीर वाले कड़क कागजों के भरे लिफाफों’ से प्रभावित किया जाता है, जिसके बाद वे नियम-कानून भूल जाते हैं। यह आरोप प्रशासन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इस मामले में दल्ली-राजहरा अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) सुरेश कुमार साहू से पत्रकारों ने जब संपर्क किया, तो उनका जवाब अस्पष्ट और दो टूक था। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत कुसुमकसा में जगह-जगह अवैध कब्जों की भरमार है। लेकिन सवाल यह उठता है कि शिकायत मिलने के बाद तुरंत कार्यवाही क्यों नहीं होती? राजहरा एसडीएम ने समस्या की व्यापकता तो स्वीकार की, मगर कोई समयबद्ध योजना या कार्यवाही का आश्वासन नहीं दिया। स्थानीय निवासी इसे प्रशासनिक ढिलाई का प्रमाण मानते हैं, जो भूमाफियाओं को खुली छूट दे रही है।

आपको बता दें कि बालोद जिले के ग्राम कुसुमकसा में वहीद अली नामक कसाई जो कुसुमकसा स्थित शासकीय धान खरीदी केंद्र में चपरासी भी है। उन्होंने ग्राम पंचायत कुसुमकसा की साप्ताहिक बाजार भूमि में अवैध कब्जा कर पक्का निर्माण कर एक बूचड़खाना खोल लिया है वह भी स्वास्थ्य विभाग के नियमों के तहत पूरी तरह अवैध है। वही इसी साप्ताहिक बाजार क्षेत्र में नईम कुरैशी द्वारा पक्का निर्माण कर दुकान बनाकर उसे किराए पर दे दिया गया। जहां बालोद निवासी किरायेदार द्वारा बिजली समान व बिजली से संबंधित सुधार कार्यों की दुकान संचालित की जा रही है। वही अवैध कब्जाधारी नईम कुरैशी ने गांव में गुजर रही राष्ट्रीय राजमार्ग सड़क क्रमांक 930 के निर्माण को देखते हुए नेशनल हाईवे 930 के किनारे अवैध कब्जा कर एक अंडे तथा आलू प्याज की दुकान खोल दी गई। आपको बता दें कि नईम कुरैशी द्वारा पहले ही गांव के बाजार में अवैध कब्जा कर रखा है वही उनके द्वारा नेशनल हाईवे सड़क के निकारे भी अवैध कब्जा कर लिया गया है। जबकि इस अवैध कब्जे का आधा हिस्सा एनएस 930 में तथा आधा हिस्सा गांव के ही एक गरीब आदिवासी के खेत में किया गया है। आदिवासी डरा सहमा व घबराया हुआ है।
वही ग्राम पंचायत की जिम्मेदार महिला सरपंच भी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है।
यह समस्या केवल कुसुमकसा तक सीमित नहीं है। दुर्ग संभाग के कई ग्रामीण इलाकों में शासकीय जमीनों पर अतिक्रमण आम हो चुका है। शिकायतकर्ता बताते हैं कि आयुक्त को सौंपी गई शिकायतों पर केवल खानापूर्ति की जाती हैं, जबकि जमीनी सत्यापन या बुलडोजर कार्यवाही का नामोनिशान नहीं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया हुआ है। आइए जानें सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश : अवैध कब्जे पर जीरो टॉलरेंस
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे को राष्ट्रीय आपदा करार दिया है। 2020 में यू.पी. अवैध कब्जा हटाओ अभियान से जुड़े मामले में कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश जारी किए कि राज्य सरकारें शासकीय जमीनों से अतिक्रमण हटाने के लिए तत्काल अभियान चलाएं। जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच ने कहा कि अवैध कब्जे सार्वजनिक संपत्ति के दुरुपयोग हैं और इन्हें बिना देरी के हटाया जाए। कोर्ट ने राज्यों को समयबद्ध योजना बनाने का आदेश दिया, जिसमें नोटिस जारी करना, सुनवाई के बाद बेदखली और दोषियों पर जुर्माना लगाना शामिल है।
फरवरी 2022 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पुनः जोर दिया कि अधिकारी अवैध कब्जे हटाने में विफल रहें, तो उनके खिलाफ विभागीय जांच हो। जयपाल सिंह बनाम राज्य सरकार मामले में कोर्ट ने कहा कि ग्राम सभा या पंचायत भूमि पर कब्जा करने वालों को कोई वैधानिक अधिकार नहीं मिल सकता। हाल के वर्षों में कोर्ट ने कई राज्यों को फटकार लगाई, जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल रहा। कोर्ट के अनुसार, शासकीय भूमि का उपयोग गरीबों के कल्याण, स्कूल, अस्पताल आदि के लिए होना चाहिए, न कि निजी हितों के लिए। इन आदेशों के बावजूद दुर्ग संभाग में अमल न होना कोर्ट की अवमानना का रूप ले चुका है।

दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही जरूरी
नियमों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर कदम उठाने की मांग तेज हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, यदि कोई एसडीएम, तहसीलदार या आयुक्त शिकायत पर 15 दिनों में कार्यवाही न करे, तो उनके विरुद्ध विभागीय जांच शुरू होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर निलंबन, वेतन कटौती या आपराधिक मुकदमा दर्ज हो सकता है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) के तहत रिश्वत लेने वाले अधिकारियों को 7 वर्ष तक की कैद हो सकती है। वही छत्तीसगढ़ लोकायुक्त को भी ऐसे मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार है। स्थानीय स्तर पर राजहरा एसडीएम जैसे अधिकारियों को जवाबदेह बनाना होगा, ताकि भविष्य में लापरवाही न हो।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्यवाही न हुई, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। आयुक्त कार्यालय भी इस मामले में चुप्पी साधे हुए है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवैध कब्जाधारियों की ऊंची पहुंच है। यह स्थिति न केवल कानून का मजाक उड़ा रही है, बल्कि गरीबों की जमीनें हड़पने वालों को बढ़ावा दे रही है। प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए विशेष अभियान चलाना चाहिए।




