बिलासपुर प्रेस क्लब : विवादित चुनाव की शपथ पर सियासी संग्राम, क्या डिप्टी सीएम साव का कदम न्यायिक प्रक्रिया को देगा चुनौती?…

बिलासपुर। प्रेस क्लब के चुनावी घमासान ने अब एक नया और गंभीर मोड़ ले लिया है। जिस चुनाव को रजिस्ट्रार ने ‘रद्द’ कर दिया और जिसका मामला वर्तमान में शासन के पास अपील में लंबित है, उसके निर्वाचित पदाधिकारियों को शपथ दिलाने के लिए उपमुख्यमंत्री अरुण साव के शामिल होने की खबर ने शहर के गलियारों में चर्चाएं तेज कर दी हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या यह कदम विचाराधीन न्यायिक अपील के निर्णय को प्रभावित करने की एक कोशिश है?
मुख्यमंत्री ने बनाई थी दूरी, डिप्टी सीएम दिखा रहे हैं दिलचस्पी? – याद दिला दें कि इसी विवादित चुनाव के बाद 26 जनवरी 2026 को भी शपथ ग्रहण की तैयारी की गई थी। उस वक्त मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को आमंत्रित किया गया था, लेकिन मामले की संवेदनशीलता और कानूनी पेचीदगियों को भांपते हुए मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम से दूरी बनाए रखना ही उचित समझा। अब 20 फरवरी को एक निजी होटल में आयोजित समारोह में डिप्टी सीएम अरुण साव की उपस्थिति को लेकर प्रेस क्लब के सदस्यों और कानूनी जानकारों में गहरा मतभेद उभर आया है।
रजिस्ट्रार के आदेश पर उठे सवाल: क्या ‘अधिकार क्षेत्र’ से बाहर हुआ फैसला? – प्रेस क्लब चुनाव 19 सितंबर 2025 को संपन्न हुए थे, जिसमें दिलीप यादव अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। हालांकि, पराजित उम्मीदवारों की शिकायतों के आधार पर रजिस्ट्रार पद्मिनी भोई साहू ने 18 नवंबर 2025 को चुनाव रद्द कर दिया।
विवाद के मुख्य बिंदु :
- सुनवाई का अभाव : निर्वाचित पदाधिकारियों का आरोप है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना ही चुनाव रद्द कर दिया गया।
- नियमों की अनदेखी : चुनाव रद्द होने के छह दिन बाद ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया, जो कानूनी प्रक्रिया के विपरीत प्रतीत होता है।
- अपील लंबित : हाईकोर्ट के निर्देश पर वर्तमान में उद्योग एवं वाणिज्य विभाग में रजिस्ट्रार के आदेश के खिलाफ अपील विचाराधीन है, जिस पर जल्द ही फैसला आने के संकेत हैं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय: क्या यह ‘Ultra Vires’ की श्रेणी में है? – कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अपील पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक किसी भी भव्य शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह प्रशासनिक तटस्थता पर भी सवाल खड़े करता है। जानकारों के अनुसार, किसी उच्च पदस्थ संवैधानिक पदाधिकारी की उपस्थिति न्यायिक प्रक्रिया और लंबित अपील के निर्णय पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश मानी जा सकती है।
गहराता मतभेद : क्या प्रेस क्लब की साख दांव पर है? – बिलासपुर प्रेस क्लब के अधिकांश सदस्यों के बीच इस समारोह को लेकर असंतोष है। चर्चा है कि जब राज्य का प्रमुख (मुख्यमंत्री) विवाद की गंभीरता को देखते हुए पीछे हट गया, तो उपमुख्यमंत्री का शामिल होना क्या संदेश देता है? क्या यह शासन के भीतर ही विरोधाभासी संकेतों को जन्म नहीं दे रहा?
मुख्य प्रश्न जो अब भी अनुत्तरित हैं :
- क्या डिप्टी सीएम की उपस्थिति लंबित अपील के निर्णय को प्रभावित करेगी?
- क्या बिना वैध प्रक्रिया और सुनवाई के हुए फैसलों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है?
- क्या प्रेस क्लब का यह विवाद अब लोकतांत्रिक संस्था की मर्यादा से निकलकर विशुद्ध ‘सियासी वर्चस्व’ की जंग बन चुका है?




