विस्फोटक रिपोर्ट : रायपुर में ‘खाकी’ का दोहरा चरित्र? 30 हजार की घूस पर ‘एक्शन’, नक्सल खुफिया लीक पर ‘प्रोटेक्शन’?…

छत्तीसगढ़ | विशेष संवाददाता। क्या छत्तीसगढ़ में कानून का राज है, या ‘रसूख’ का? राजधानी रायपुर के पुलिस महकमे और सत्ता के गलियारों में यह सवाल अब सुलगती आग बन चुका है। मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक गंभीर खिलवाड़ का है।
एक तरफ 30,000 रुपये की रिश्वत के आरोप में एक पुलिसकर्मी की वर्दी उतार दी जाती है (सस्पेंशन), वहीं दूसरी तरफ नक्सल खुफिया जानकारी लीक करने जैसे देश की सुरक्षा से जुड़े संगीन आरोप झेल रहीं डीएसपी कल्पना वर्मा पर सरकार और पुलिस मुख्यालय ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।

जनता पूछ रही है – क्या गुनाह का वजन कानून की तराजू पर नहीं, बल्कि आरोपी के ‘आकाओं’ के वजन से तौला जा रहा है?
दो तराजू, दो विधान : सुशासन या कुशासन? – रायपुर में इन दिनों ‘न्याय’ का एक अजीब मॉडल देखने को मिल रहा है:
- छोटा पद, छोटा अपराध = तत्काल कार्रवाई: एक अधिकारी पर 30 हजार की रिश्वत का आरोप लगा, प्रशासन ने पलक झपकते ही सस्पेंशन ऑर्डर थमा दिया। संदेश—हम भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे।
- बड़ा पद, ‘देशद्रोह’ जैसा अपराध = पूर्ण संरक्षण: डीएसपी स्तर की अधिकारी पर नक्सलियों से जुड़ी संवेदनशील खुफिया जानकारी लीक करने का आरोप है। यह वो जानकारी है जिस पर जवानों की जान टिकी होती है। नतीजा? न निलंबन, न जांच, सिर्फ सन्नाटा।
बड़ा सवाल: क्या छत्तीसगढ़ पुलिस की नज़र में खुफिया जानकारी (Intelligence) की कीमत 30,000 रुपये से भी कम है?
CM हाउस से ‘रिमोट कंट्रोल’ सुरक्षा? – मामले ने तूल तब पकड़ा जब सामाजिक कार्यकर्ता कुनाल शुक्ला ने सोशल मीडिया पर एक बम फोड़ा। उनके आरोपों ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है।
शुक्ला का सीधा आरोप है कि सीएम हाउस (CM House) में बैठकर एक कथित आईपीएस अधिकारी “राहुल भगत” इस पूरे मामले में ढाल बनकर खड़े हैं। आरोप है कि यही वह ‘अदृश्य शक्ति’ है जो डीएसपी कल्पना वर्मा को नक्सल खुफिया लीक जैसे गंभीर मामले में भी आंच नहीं आने दे रही।
अगर यह दावा सच है, तो सवाल सीएम हाउस की विश्वसनीयता पर खड़ा होता है :
- क्या मुख्यमंत्री निवास से आरोपियों को ‘अभयदान’ दिया जा रहा है?
- एक आईपीएस अधिकारी को जांच रोकने या प्रभावित करने का अधिकार किसने दिया?
चुप्पी जो बहुत कुछ कहती है – हैरानी की बात यह है कि सोशल मीडिया और चौक-चौराहों पर हो रही इस थू-थू के बावजूद, पुलिस मुख्यालय (PHQ) और गृह विभाग के होंठ सिले हुए हैं।
- न तो डीएसपी पर लगे आरोपों का खंडन किया गया।
- न ही जांच कमेटी बिठाई गई।
- न ही कुनाल शुक्ला के आरोपों पर कोई सफाई आई।
यह खामोशी प्रशासनिक लाचारी है या मिलीभगत की मौन स्वीकृति? जब रक्षक ही खुफिया तंत्र में सेंध लगाने वालों को बचाने लगें, तो आंतरिक सुरक्षा ‘राम भरोसे’ ही मानी जाएगी।
गृह मंत्रालय तक पहुंची आंच : यह मामला अब छत्तीसगढ़ की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। जानकारों का कहना है कि नक्सल प्रभावित राज्य में खुफिया लीक को ‘विभागीय चूक’ नहीं माना जा सकता, यह सीधे तौर पर राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है। मांग उठ रही है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि राज्य की एजेंसियां शायद ‘रसूख’ के बोझ तले दब चुकी हैं।
जनता का तंज : रायपुर की फिजाओं में अब एक ही नारा गूंज रहा है : “गरीब सिपाही गलती करे तो नौकरी जाए,साहब देश की सुरक्षा बेचे तो प्रमोशन पाए!”
अब देखना यह है कि क्या सरकार इस ‘संरक्षणवादी मॉडल’ का मोह त्यागकर डीएसपी कल्पना वर्मा और उनके कथित संरक्षकों के खिलाफ जांच का साहस जुटा पाती है, या फिर ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा सिर्फ होर्डिंग्स की शोभा बनकर रह जाएगा।




