महा-संग्राम 2026 : रायपुर प्रेस क्लब की दहलीज पर ‘क्रांति’ की दस्तक; सुनील नामदेव की ‘एंट्री’ ने बिगाड़ा ‘दिग्गजों’ का खेल…

छत्तीसगढ़ | रायपुर | विशेष अन्वेषण रिपोर्ट I रायपुर प्रेस क्लब का चुनाव अब महज एक चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि “अस्तित्व की जंग” बन चुका है। गुरुवार को नामांकन के अंतिम दिन कलेक्ट्रेट परिसर में जो नजारा दिखा, उसने यह साफ कर दिया कि इस बार मुकाबला ‘दोस्ताना’ नहीं, बल्कि ‘आर-पार’ का है। वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव के नेतृत्व वाले “क्रांतिकारी पैनल” ने जिस दमखम के साथ नामांकन दाखिल किया, उसने प्रेस क्लब की सत्ता पर सालों से कुंडली मारकर बैठे सिंडिकेट की रातों की नींद उड़ा दी है।

प्रेस क्लब या ‘सौदागरों का अड्डा’? नीलेश शर्मा का सीधा प्रहार – क्रांतिकारी पैनल के रणनीतिकार और वरिष्ठ पत्रकार नीलेश शर्मा ने नामांकन के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए शब्दों के तीखे बाण छोड़े। उन्होंने कहा –
“रायपुर प्रेस क्लब आज पत्रकारों का कम और ‘पत्रकारिता के सौदागरों’ का अड्डा अधिक बन गया है। हम यहाँ पद पाने नहीं, बल्कि उस गरिमा को वापस लाने आए हैं जिसे कौड़ियों के भाव बेच दिया गया। अब समय आ गया है कि रायपुर का असली पत्रकार जाग जाए – चुनिए उसे जो आपकी कलम की ताकत बने, उसे नहीं जो आपकी कलम का सौदा करे।”
‘क्रांतिकारी पैनल’ की कोर टीम : अनुभव और तेवर का मेल – इस बार का पैनल किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। इसमें वरिष्ठता का अनुभव है, तो युवाओं का जोश और महिला पत्रकारों की सशक्त भागीदारी भी।

घोषणा पत्र नहीं, यह ‘न्याय का घोषणा’ पत्र है : क्रांतिकारी पैनल ने कलेक्ट्रेट से प्रेस क्लब तक पैदल मार्च कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। सभा के दौरान नीलेश शर्मा ने घोषणा पत्र के उन बिंदुओं को उजागर किया, जो अब तक केवल वादों की फाइलों में दबे थे:
- नवा रायपुर में छत का सपना : सालों से अधर में लटकी ‘पत्रकार आवास योजना’ को प्राथमिकता से पूरा कराना।
- शिक्षा और स्वास्थ्य : पत्रकारों के बच्चों के लिए विशेष स्कूल कोटा और परिजनों के लिए उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधा।
- महिलाओं के लिए सुरक्षित स्पेस : महिला पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब में अलग ‘वर्किंग जोन’ और शिशु गृह की सुविधा।
- सिस्टम की सफाई : क्लब में चल रही शराब और शबाब की संस्कृति को खत्म कर इसे ‘बौद्धिक विमर्श’ का केंद्र बनाना।
- कानूनी ढाल : फर्जी एफआईआर (FIR) और धमकियों के खिलाफ क्लब की ओर से वकीलों का एक पैनल हमेशा तैयार रहेगा।
चुनावी गणित : 60 उम्मीदवार, 6 पैनल, लेकिन लड़ाई ‘आमने-सामने’ – नामांकन के बाद जो समीकरण उभर रहे हैं, उनके अनुसार मैदान में आधा दर्जन पैनल हैं, लेकिन असली मुकाबला “सत्ता पक्ष” और “क्रांतिकारी पैनल” के बीच ही सिमटता दिख रहा है। सुनील नामदेव के पक्ष में दामू आंबेडारे और जे.पी. त्रिपाठी जैसे पुराने दिग्गजों का आना यह बताता है कि क्लब का ‘बुजुर्ग’ तबका भी अब बदलाव चाहता है।
क्या बदलेगा रायपुर प्रेस क्लब का नसीब? – नामांकन वापसी के बाद शुक्रवार को तस्वीर और साफ होगी, लेकिन एक बात तय है—सुनील नामदेव की एंट्री ने इस चुनाव को “ग्लैमर बनाम सरोकार” की लड़ाई बना दिया है। रायपुर के पत्रकारों के पास अब दो रास्ते हैं: या तो वे यथास्थिति बनाए रखें, या फिर क्रांतिकारी पैनल के साथ मिलकर एक नए, स्वच्छ और गौरवशाली प्रेस क्लब की नींव रखें।
बदलाव की बयार बह चुकी है, अब फैसला ‘कलम’ के सिपाहियों के हाथ में है!




