पुरुंगा में विकास बनाम जनादेश की जंग – अडानी समूह की कोल परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का निर्णायक आंदोलन, प्रशासन ड्रोन से निगरानी में व्यस्त…

रायगढ़। जिले के पुरुंगा–हाटी क्षेत्र में अडानी समूह की मेसर्स अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड (पुरुंगा भूमिगत कोल माइंस परियोजना) के खिलाफ जनआंदोलन अपने चरम पर है। गांवों की सीमाएं नाकाबंद हैं, प्रशासन ड्रोन से निगरानी में जुटा है, और पूरा इलाका लोकतांत्रिक टकराव का मैदान बन चुका है।
ग्रामीणों का कहना है – यह सिर्फ ज़मीन का नहीं, बल्कि अस्तित्व, पर्यावरण और अधिकार की लड़ाई है।
विधायकों का साथ, जनता का संकल्प – “सहमति के बिना कोई विकास नहीं” : शनिवार को आंदोलन को नई ताकत मिली जब धरमजयगढ़ विधायक लालजीत सिंह राठिया और खरसिया विधायक उमेश पटेल धरना स्थल पर पहुँचे। दोनों ने ग्रामीणों से मुलाकात की और आंदोलन को “जनता की आवाज़” बताया।
उमेश पटेल ने कहा –
“प्रदेश की जनता विकास चाहती है, विनाश नहीं। बिना ग्रामसभा की अनुमति और पर्यावरणीय आकलन के किसी परियोजना को थोपना जनाधिकारों का उल्लंघन है। यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है।”
वहीं लालजीत राठिया ने प्रशासन पर “हठधर्मिता” का आरोप लगाया।
“लोग बार-बार विरोध दर्ज करा रहे हैं, फिर भी कलेक्टर और कंपनी प्रबंधन जनभावनाओं को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। जब तक ग्रामीण सहमत नहीं, तब तक परियोजना लागू नहीं होने दी जाएगी।”
धरना स्थल पर बड़ी संख्या में महिलाएँ, युवा और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। गांव-गांव में रातभर पहरा और चौकसी जारी है।
नाकाबंदी और ड्रोन निगरानी – जनता ज़मीन पर, सरकार आसमान से देख रही : ग्रामीणों ने सामूहिक निर्णय लेकर गांवों की सीमाओं पर नाकाबंदी कर दी है। अब किसी भी कंपनी प्रतिनिधि या प्रशासनिक अधिकारी को गांव में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से इलाके की ड्रोन कैमरों से निगरानी शुरू कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक और जनहितकारी है, लेकिन जब तक जनसुनवाई स्थगित नहीं की जाती, वे पीछे नहीं हटेंगे।एक प्रदर्शनकारी ने कहा –
“हम अपने खेत, जंगल और जलस्रोत बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारी भूमि ही हमारी पहचान है। किसी भी कीमत पर खदान नहीं खुलने देंगे।”
प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है।
हालांकि सूत्र बताते हैं कि जिला प्रशासन उच्च अधिकारियों के साथ परामर्श में जुटा है ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न जाए।
धरमजयगढ़ और खरसिया पुलिस बल को अलर्ट मोड पर रखा गया है।
स्थानीय जनसंगठनों का कहना है कि अगर संवाद की प्रक्रिया नहीं शुरू हुई तो आने वाले दिनों में आंदोलन और उग्र हो सकता है।
कंपनी और सरकार का पक्ष – “धरती के नीचे ऊर्जा, ऊपर हरियाली जस की तस” : सरकारी और कॉर्पोरेट हलकों का कहना है कि पुरुंगा भूमिगत कोल माइंस परियोजना भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। कंपनी का दावा है कि यह परियोजना 2.25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता के साथ पूरी तरह भूमिगत खनन तकनीक पर आधारित है, जिससे सतह पर पर्यावरणीय क्षति, विस्फोट या धूल प्रदूषण नहीं होगा।कोयला मंत्रालय का कहना है –
“भूमिगत खनन धरती की गहराई से संसाधन निकालता है, पर सतह की हरियाली, खेती और जंगल को अक्षुण्ण रखता है।”
कंपनी के दावे :
- खनन 500 से 2000 फीट गहराई में होगा, सतह पर कोई खुदाई या ब्लास्टिंग नहीं।
- भूजल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि स्थानीय ट्यूबवेल 40–50 फीट गहराई तक ही हैं।
- वन्यजीवों के आवास सुरक्षित रहेंगे, शोर और कंपन लगभग नगण्य होंगे।
- खदान से निकलने वाले पानी को शुद्ध कर ग्रामीणों के उपयोग के लिए दिया जाएगा।
कंपनी का कहना है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर मिलेंगे। साथ ही, पंचायतों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क विकास जैसी सुविधाएं CSR कार्यक्रमों के तहत दी जाएंगी।
विकास बनाम विश्वास – लोकतंत्र की असली परीक्षा : पुरुंगा का संघर्ष अब सिर्फ खदान विरोध नहीं, बल्कि विकास और जनसहमति के बीच टकराव की पहचान बन चुका है। एक ओर सरकार और कंपनी “सतत विकास” की मिसाल पेश करने का दावा कर रही हैं, तो दूसरी ओर जनता पूछ रही है –
“क्या विकास जनता की अनुमति के बिना संभव है?”
यह सवाल अब रायगढ़ की सीमाओं से निकलकर छत्तीसगढ़ की राजनीति और नीति-निर्माण के केंद्र तक पहुँच चुका है।
सम्पादकीय निष्कर्ष :
पुरुंगा–हाटी क्षेत्र का यह आंदोलन सिर्फ एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि पर्यावरण, आजीविका और जनसहमति के अधिकार का प्रतीक बन गया है। जनता की एकजुटता और जनप्रतिनिधियों के समर्थन ने इसे एक राज्यव्यापी चेतना में बदल दिया है।
धरती के नीचे ऊर्जा की परतें हैं,
पर ऊपर जनता की जड़ें हैं –
और जब जड़ें हिलती हैं, तो हर विकास-नीति को अपने औचित्य पर पुनर्विचार करना पड़ता है।





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