चाम्पा पुलिस का ‘गांधीवादी’ मॉडल : गुंडे लाठियां बरसा रहे और पुलिस ‘शांति का नोबेल’ जीतने की तैयारी में!…

• गजब की कानून-व्यवस्था : इधर अपराधियों ने पेट्रोल और माचिस तैयार रखी है, उधर पुलिस शायद ‘मुहूर्त’ का इंतजार कर रही है।…
चाम्पा (व्यंग्य संकलन) : अगर आपको लगता है कि पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना है, तो चाम्पा थाने आकर अपनी गलतफहमी दूर कर लीजिए। यहाँ की पुलिस ने ‘अहिंसा’ का ऐसा मार्ग चुना है कि अपराधी सरेआम घर फूंकने की धमकी दे रहे हैं और पुलिस अपनी फाइलों में ‘अध्यात्म’ खोज रही है। छहुईया तालाब मोहल्ले में एक परिवार को ‘जादू-टोना’ के नाम पर जिंदा जलाने का अल्टीमेटम मिल चुका है, लेकिन चाम्पा पुलिस का ‘इंटेलिजेंस’ शायद अभी यह रिसर्च कर रहा है कि “क्या सच में माचिस से आग लगती है?”

पुलिस की ‘विजिट’ या अपराधियों के लिए ‘एनर्जी ड्रिंक’? – चाम्पा पुलिस की जांच का तरीका भी कमाल का है। पुलिस मोहल्ले में आती है, अपराधियों से शायद ‘हाल-चाल’ पूछती है और जैसे ही उनकी गाड़ी का धुआं ओझल होता है, अपराधियों में शेर वाली फुर्ती आ जाती है। लाठी-डंडे निकलते हैं, दरवाजे पीटे जाते हैं और पत्रकार बेटे को ‘गिफ्ट’ में झूठे केस की धमकी दी जाती है। पुलिस की इस अति-सौम्य कार्यशैली को देखकर तो ऐसा लगता है मानो अपराधी और पुलिस के बीच कोई ‘म्यूचुअल फ्रेंडशिप’ चल रही हो।
‘ऊपर तक पहुंच’ और खाकी की ‘निचली’ खामोशी – आरोपी मोहल्ले में चिल्ला रहे हैं कि उनका संपर्क ‘क्रिमिनल्स’ से है और ऊपर तक सेटिंग है। अब बेचारे पुलिस वाले करें भी तो क्या करें? शायद वे डर रहे हैं कि अगर इन ‘रसूखदार’ गुंडों पर हाथ डाला, तो कहीं उनका ट्रांसफर किसी ऐसी जगह न हो जाए जहाँ चैन की नींद न मिले। इसलिए, “जब तक घर जल न जाए, तब तक एफआईआर कैसी?” वाला फॉर्मूला अपनाया जा रहा है।
2026 का ‘डिजिटल अंधविश्वास’ और पुलिसिया सपोर्ट – दुनिया चाँद पर बसने की सोच रही है, और चाम्पा के वार्ड 26 में ‘डायन’ का टैग लगाकर सरेआम मॉब लिंचिंग की भूमिका रची जा रही है। लेकिन चाम्पा पुलिस इस पूरे सीन में ‘रेफरी’ की भूमिका में है। वे देख रहे हैं कि कौन कितनी जोर से चिल्लाता है और कौन कितनी अच्छी धमकी देता है। पत्रकार को झूठे केस में फंसाने की धमकी तो ऐसी दी जा रही है जैसे कानून चाम्पा पुलिस की जेब में नहीं, बल्कि उन गुंडों की लाठी में बंधा हो।
चाम्पा थाना प्रभारी जी, आपकी यह ‘अति-सभ्य’ चुप्पी अपराधियों के लिए ‘सर्टिफिकेट’ है। अगर कल को उस परिवार का घर वाकई श्मशान बन गया, तो क्या आप वहां ‘जांच-जांच’ का खेल खेलेंगे? या फिर तब तक वेट करेंगे जब तक अपराधी खुद आकर सरेंडर न कर दें कि “साहब, हमने काम तमाम कर दिया, अब चाय पिलाइये?”
चाम्पा पुलिस को चाहिए कि वे थाने के बाहर एक बोर्ड लगा दें – “यहाँ केवल शांति की बातें होती हैं, सुरक्षा के लिए अपनी लाठी खुद साथ लाएं।”
पूर्व में प्रकाशित खबर :




