रायगढ़ में ‘सिंघम’ बने अधिकारी, तो घरघोड़ा में ‘धृतराष्ट्र’ क्यों? माफियाओं पर कार्रवाई में भेदभाव के उठ रहे सवाल!…

रायगढ़/घरघोड़ा। जिले में इन दिनों खनिज विभाग दो अलग-अलग चेहरों के साथ नजर आ रहा है। एक तरफ कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी के निर्देश पर रायगढ़ तहसील और संबलपुरी में 31 गाड़ियों को जब्त कर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी फुर्ती दिखाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर घरघोड़ा क्षेत्र के लोग पूछ रहे हैं – “साहब, हमारी तरफ कब नजर इनायत होगी?”
एक तरफ ‘हंटर’, दूसरी तरफ ‘अभयदान’! – पिछले एक हफ्ते में खनिज विभाग ने रायगढ़, खरसिया और रैरूमा में रेत, मुरूम और चूना पत्थर ले जा रहे 27 ट्रैक्टर और कई हाईवा जब्त किए। संबलपुरी में तो आधी रात को छापेमारी कर हरिओम अग्रवाल जैसे रसूखदारों के सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि घरघोड़ा क्षेत्र, जो अवैध खनन का ‘हब’ बनता जा रहा है, वहां खनिज अमले की गाड़ियां रास्ता भूल गई लगती हैं।
घरघोड़ा : प्रशासन की नाक के नीचे ‘काला खेल’ : घरघोड़ा में अवैध उत्खनन और परिवहन की शिकायतें नई नहीं हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यहाँ दिन-रात भारी मशीनें जमीन का सीना चीर रही हैं, लेकिन मजाल है कि किसी अधिकारी की गाड़ी वहां तक पहुँच जाए।
- सवाल 1 : क्या घरघोड़ा के माफिया रायगढ़ के माफियाओं से ज्यादा रसूखदार हैं?
- सवाल 2 : क्या विभाग की ‘सक्रियता’ सिर्फ चुनिंदा इलाकों के लिए आरक्षित है?
- सवाल 3 : आखिर घरघोड़ा में कार्रवाई के नाम पर प्रशासन को कौन सा ‘सांप सूंघ’ जाता है?
संबलपुरी में कार्रवाई से बढ़ी उम्मीदें और आक्रोश : 02 जनवरी की रात संबलपुरी में हुई कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो, तो माफिया कितना भी बड़ा हो, उसे दबोचा जा सकता है। खनिज अधिकारी रामाकांत सोनी और निरीक्षक सोमेश्वर सिन्हा की टीम ने वहां जेसीबी और टिप्पर जब्त कर अपनी ताकत दिखाई है। अब जनता का सवाल सीधा है – यही ताकत और यही कानूनी हंटर घरघोड़ा के अवैध घाटों और खदानों पर कब चलेगा?
कड़वा सच : कलेक्ट्रेट परिसर में जब्त वाहनों की कतार लग रही है, लेकिन इनमें घरघोड़ा से आने वाले वाहनों की संख्या ‘शून्य’ के बराबर है। यह विडंबना ही है कि जहां सबसे ज्यादा शिकायतें हैं, वहीं सबसे कम कार्रवाई हो रही है।
चेतावनी या सिर्फ खानापूर्ति? – जिला प्रशासन का दावा है कि कार्रवाई निरंतर जारी रहेगी। लेकिन यह कार्रवाई तब तक ‘एकतरफा’ मानी जाएगी, जब तक घरघोड़ा के जंगलों और पहाड़ों को खोखला कर रहे बड़े खिलाड़ियों पर हाथ नहीं डाला जाता।
अब देखना यह है कि क्या कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी का ‘चाबुक’ घरघोड़ा के भ्रष्ट तंत्र और बेखौफ माफियाओं पर चलता है, या फिर यह इलाका अधिकारियों की फाइलों में ‘सुरक्षित’ ही बना रहेगा।
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