बिलासपुर की अरपा पर माफिया का कब्ज़ा ; हाईकोर्ट के आदेश हवा में, प्रशासन की चुप्पी संदिग्ध…

बिलासपुर। लगता है बालू माफिया अब अरपा नदी को बंजर कर ही दम लेंगे। एक ओर हाईकोर्ट और सरकार अरपा को उसकी पुरानी धारा लौटाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर माफियाओं की बेखौफ लूट और प्रशासन की चुप्पी ने नदी का अस्तित्व ही संकट में डाल दिया है।
हाईकोर्ट अरपा की दुर्दशा पर कई बार प्रशासन को फटकार लगा चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस हैं। अब माफिया रात का अंधेरा नहीं, बल्कि दिनदहाड़े अरपा का सीना छलनी कर रहे हैं।
सुबह से ही शुरू हो जाता है अवैध उत्खनन : सेंदरी और निरतु घाट पर पिछले पखवाड़े से रोज़ाना सुबह 5 बजे से 10 बजे तक खुलेआम अवैध रेत उत्खनन और परिवहन का धंधा चल रहा है। जबकि अरपा के किसी भी घाट को स्वीकृति प्राप्त नहीं है, फिर भी हर दिन हज़ारों ट्रिप ट्रैक्टर और हाईवा रेत ढोते हैं।
हैरानी की बात यह है कि यह लूट शहर के मुख्य मार्ग के समानांतर हो रही है, और प्रशासन मूक दर्शक बना बैठा है।
सरपंच–खनिज विभाग की मिलीभगत : सूत्रों का दावा है कि सेंदरी और निरतु घाट पर यह गोरखधंधा स्थानीय सरपंचों और खनिज विभाग के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से फल-फूल रहा है। निरतु सरपंच को हर महीने लगभग 30 हज़ार रुपये और सेंदरी सरपंच को प्रति ट्रिप 200 रुपये की ‘कटौती’ दी जाती है।
सेंदरी घाट से रोज़ाना करीब 200 ट्रिप ट्रैक्टर रेत ढो रहे हैं, जबकि निरतु घाट पर इससे भी ज्यादा। जेसीबी मशीनें सुबह होते ही नदी का पेट चीरना शुरू कर देती हैं।
शिकायतों के बाद भी कार्रवाई गायब :ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों ने कई बार माइनिंग विभाग को शिकायत दी है। यहाँ तक कि निरतु श्मशान घाट के पास खड़े रेत के पहाड़ों की जानकारी भी दी गई। बावजूद इसके न तो खनिज अमला हिला, न ही जिला प्रशासन।
लोगों का आरोप है कि बालू माफियाओं ने पूरे तंत्र को खरीद लिया है। हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद अफसरशाही हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
ग्राम सचिव तक शामिल : इस धंधे में ग्राम सचिव की भी सीधी संलिप्तता सामने आई है। उसके घर के सामने ही रेत का पहाड़ खड़ा है। आरोप है कि इस सचिव पर पहले हत्या का मामला भी दर्ज हो चुका है, फिर भी वह पद पर कायम है और माफियाओं को खुला संरक्षण दे रहा है।
अरपा की सांसें थम रही हैं : अरपा नदी, जो बिलासपुर की जीवनरेखा और पहचान है, आज माफियाओं की लूट का शिकार है। अदालत की चिंता और आदेशों के बावजूद प्रशासन की उदासीनता साफ संकेत देती है—या तो माफियाओं का दबदबा इतना गहरा है कि तंत्र पंगु हो गया है, या फिर पूरी व्यवस्था ने आंख मूंद लेने का निश्चय कर लिया है।




