धरमजयगढ़ : कलम की जगह नन्हे हाथों में झाड़ू ; सरकारी स्कूल में नौनिहालों के भविष्य पर झाड़ू फेरता सिस्टम!…

- ‘स्वच्छता पखवाड़े’ के नाम पर अफसरों की बेशर्म लीपापोती; बीईओ को वीडियो देखने की फुर्सत नहीं, डीईओ बोले -‘मिलजुल कर कर रहे सफाई’…
रायगढ़। ‘पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया’ – सरकारी विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर चमकते ये खोखले नारे उस वक्त तार-तार हो गए, जब धरमजयगढ़ ब्लॉक के एक सरकारी स्कूल से आई तस्वीरों ने पूरे शिक्षा तंत्र के संवेदनहीन चेहरे को बेनकाब कर दिया। जिन नन्हे हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए थी, उन मासूमों को सुबह 9 बजे स्कूल परिसर में झाड़ू थमाकर पसीना बहाने पर मजबूर किया गया।
मामला आदिम जाति कल्याण शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला, अलोला का है। जहां गरीब और आदिवासी परिवारों के बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य का सपना लेकर स्कूल पहुंचते हैं, लेकिन प्रबंधन ने उन्हें विद्यार्थी नहीं, बल्कि मुफ्त का सफाईकर्मी समझ लिया।
सुबह 9 बजे बस्ते छोड़कर कचरा समेटते रहे मासूम – प्रत्यक्षदर्शियों और वायरल वीडियो के अनुसार, दो दिन पहले सुबह जब स्कूल की घंटी बजी और कक्षाओं में पढ़ाई शुरू होनी चाहिए थी, ठीक उसी समय छोटे-छोटे मासूम बच्चे स्कूल के मैदान और परिसर में झाड़ू लगाते नजर आए। जिस उम्र में बच्चों को ककहरा सीखना चाहिए, उस उम्र में वे स्कूल का कूड़ा साफ कर रहे थे।
वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। ग्रामीणों का साफ कहना है कि स्कूल में शिक्षकों और कर्मचारियों की मौजूदगी के बावजूद बच्चों से मजदूरी कराई जा रही है। सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों को सिर्फ इसलिए चलाया जा रहा है ताकि गरीब बच्चों से झाड़ू-पोंछा कराया जा सके?
अफसरों की संवेदनहीनता: कोई व्यस्त, तो कोई ढूंढ रहा बहाने – इस शर्मनाक घटना के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों का रवैया और भी ज्यादा हैरान करने वाला है:
- धरमजयगढ़ बीईओ (सुखरुराम सिदार) : खंड शिक्षा अधिकारी का रटा-रटाया और गैर-जिम्मेदाराना जवाब सामने आया – “जानकारी मिली है, लेकिन वीडियो नहीं देखा। किसी कार्यक्रम में व्यस्त हूं, पता करेंगे।” सवाल उठता है कि जब बच्चों के शोषण का वीडियो पूरे जिले में तैर रहा है, तब जिम्मेदार अधिकारी को उस वीडियो को देखने तक की फुर्सत क्यों नहीं है?
- जिला शिक्षा अधिकारी (श्यामानंद साहू) : डीईओ साहब ने मामले की गंभीरता को समझने के बजाय ‘स्वच्छता पखवाड़े’ की ढाल आगे कर दी। उनका कहना है कि “स्वच्छता पखवाड़ा है, इसलिए मिलजुल कर सफाई कर रहे हैं।” हालांकि उन्होंने रिपोर्ट मंगाने की बात भी कही, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वच्छता पखवाड़े की पूरी जिम्मेदारी केवल प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक शाला के नन्हे बच्चों के कंधों पर है? क्या कभी किसी एसी दफ्तर में बैठे अधिकारी ने पखवाड़े के नाम पर खुद झाड़ू उठाई?
सिस्टम से सीधे 4 तीखे सवाल :
- सफाई का बजट कहां गया? हर सरकारी स्कूल में साफ-सफाई और रखरखाव के नाम पर सरकारी फंड जारी होता है। अलोला स्कूल का वह बजट किसकी जेब में जा रहा है कि बच्चों से झाड़ू लगवानी पड़ रही है?
- पढ़ाई के घंटों में श्रमदान क्यों? अगर स्वच्छता पखवाड़ा ही था, तो क्या इसके लिए बच्चों के पढ़ाई का समय (सुबह 9 बजे) छीनना जरूरी था?
- शिक्षकों पर कार्रवाई कब? जिस वक्त बच्चे झाड़ू लगा रहे थे, उस वक्त स्कूल के शिक्षक और प्रधानाध्यापक कहां थे? क्या उन पर बाल श्रम और मानसिक प्रताड़ना की धाराओं में कार्रवाई होगी?
- कागजी जांच का खेल कब तक? हर बार वीडियो वायरल होने पर “रिपोर्ट तलब करेंगे” का राग अलाप कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। क्या इस बार किसी पर ठोस गाज गिरेगी या पखवाड़े के नाम पर लीपापोती कर दी जाएगी?
गरीब और आदिवासी अंचल के बच्चों की लाचारी का फायदा उठाकर उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित करना अक्षम्य अपराध है। अगर प्रशासन ने इस मामले में लीपापोती करने वाले अधिकारियों और लापरवाह शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो यह साबित हो जाएगा कि इस व्यवस्था में बच्चों का भविष्य नहीं, बल्कि सिर्फ अफसरों की कुर्सियां सुरक्षित हैं।




