बालोद

उपेक्षा के दंश से कराह रहा दल्ली राजहरा : क्या ‘बालोद-दल्ली राजहरा’ संयुक्त नामकरण और विभागों की शिफ्टिंग से लौटेगी मृतप्राय शहर में रौनक?

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद/राजहरा। छत्तीसगढ़ राज्य में प्रशासनिक सुगमता और स्थानीय भावनाओं का सम्मान करते हुए कई नए जिलों का गठन किया गया है। जिनमें गौरेला – पेंड्रा – मरवाही, सारंगढ़ – बिलाईगढ़, मोहला – मानपुर – अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़ – छुईखदान – गंडई और मनेंद्रगढ़ – चिरमिरी-भरतपुर जैसे क्षेत्रों को जोड़कर नए जिलों का दर्जा दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि विकास की मुख्यधारा से छूटे इलाकों को अलग पहचान दी जा सकती है। परंतु, इस प्रशासनिक पुनर्गठन के बीच एक यक्ष प्रश्न लगातार कौंध रहा है कि आखिर पूरे जिले को सर्वाधिक राजस्व देने वाले ऐतिहासिक लौह अयस्क भंडार पर बसे शहर दल्ली राजहरा के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? जब अन्य स्थानों पर संयुक्त नामों से जिले बन सकते हैं, तो जिले का नाम ‘बालोद-दल्ली राजहरा’ क्यों नहीं किया जा सकता? आज दल्ली राजहरा अपनी बदहाली के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और इसकी दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवन की दरकार है।

बदहाली की कगार पर खड़ा राजस्व का मुख्य स्रोत

दल्ली राजहरा केवल एक शहर नहीं, बल्कि भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) की रीढ़ और समूचे क्षेत्र के आर्थिक विकास का पावरहाउस रहा है। इस शहर ने दशकों तक राज्य और केंद्र सरकार की तिजोरी में अरबों रुपये का राजस्व जमा किया जाता रहा है जो आज भी जारी है। दुर्भाग्य से, आज वही शहर आर्थिक तंगी और प्रशासनिक उपेक्षा की अंतिम सांसें गिन रहा है।

यदि आज भी इस शहर के बाजार गुलजार हैं और शहर उजड़ने से बचा हुआ है, तो इसका पूरा श्रेय यहां के जुझारू और मेहनतकश व्यापारियों को जाता है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। इसके विपरीत, शहर के कथित जन प्रतिनिधियों, राजनीतिक नेताओं और यूनियन नेताओं के स्वार्थ ने इस शहर को विकास की दौड़ में मीलों पीछे धकेल दिया। नए उद्योगों, कारखानों और व्यापारिक परियोजनाओं के जो सपने यहां की जनता को दिखाए गए थे, वे स्थानीय नेतृत्व की अकर्मण्यता और लालच की बलि चढ़ गए।

झूठे दावों और सियासी साजिशों की भेंट चढ़ा जिला बनने का हक

वर्षों पूर्व, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार के कार्यकाल में अविभाजित दुर्ग जिले को विभाजित कर नए जिले के गठन की रूपरेखा तैयार की जा रही थी, तब दल्ली राजहरा सबसे प्रबल दावेदार था। लेकिन उस दौरान शहर के कुछ स्वार्थी नेताओं ने अपने निजी व राजनीतिक आकाओं के इशारों पर एक भ्रामक तंत्र रचा। जनता के बीच यह अफवाह फैलाई गई कि दल्ली राजहरा में शासकीय भवनों के निर्माण के लिए राजस्व भूमि उपलब्ध नहीं है, क्योंकि अधिकांश भूमि बीएसपी और रेलवे के पास है।

यह तर्क पूरी तरह से तथ्यात्मक रूप से गलत और गुमराह करने वाला था। दल्ली राजहरा से बिल्कुल सटा हुआ चिखलकसा नगर पंचायत क्षेत्र है, जहाँ की सीमाएं चिखलकसा और दल्ली राजहरा आपस में पूरी तरह जुड़ी हुई हैं। चिखलकसा क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में राजस्व एवं वन भूमि का विशाल भंडार मौजूद था, जहाँ कलेक्ट्रेट, एसपी कार्यालय सहित सभी प्रमुख विभागों के प्रशासनिक भवन आसानी से बनाए जा सकते थे। लेकिन इस सच को दबा दिया गया और जिला मुख्यालय बालोद ले जाया गया।

विडंबना देखिए, बालोद को जिला मुख्यालय घोषित करने के बाद भी अधिकांश जिला स्तरीय कार्यालय बालोद शहर में न बनकर उससे काफी दूर ग्राम सिवनी में स्थापित किए गए। यदि सिवनी में दूरस्थ कार्यालय बन सकते थे, तो दल्ली राजहरा के चिखलकसा क्षेत्र में क्यों नहीं? आपको बता दें कि दल्ली राजहरा में उस समय की ग्राम पंचायत चिखलकसा को जोड़ने की बात चली थी लेकिन चिखलकसा और दल्ली राजहरा के भाजपा नेताओं की स्वयं के वर्चस्व की लड़ाई ने दल्ली राजहरा को गहरी खाई में धकेल दिया था।

जन-चुप्पी और जिले के पुनर्गठन की नई आस

दल्ली राजहरा की जनता और प्रबुद्ध वर्ग की लंबी चुप्पी का ही परिणाम है कि आज तक इस ऐतिहासिक अन्याय पर किसी ने खुलकर आवाज नहीं उठाई। लेकिन समय रहते अगर किसी गलती को सुधारा जाए, तो उसे देर नहीं कहा जाता। आज भी स्थिति को संभाला जा सकता है।

राज्य के संवेदनशील और लोकप्रिय मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और भारतीय जनता पार्टी की सरकार के पास इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का स्वर्णिम अवसर है। यदि सरकार पहल करते हुए जिले का पुनर्नामकरण ‘बालोद-दल्ली राजहरा’ अथवा ‘दल्ली राजहरा-बालोद’ करती है, तो यह इस क्षेत्र की जनता के साथ बड़ा न्याय होगा।

आर्थिक पुनरुद्धार और व्यावहारिक समाधान

दल्ली राजहरा को संजीवनी देने के लिए केवल नाम बदलना ही काफी नहीं होगा, बल्कि प्रशासनिक संतुलन स्थापित करना भी जरूरी है :

  • कार्यालयों की शिफ्टिंग : बालोद जिले के ऐसे कई शासकीय विभाग, जो वर्तमान में सिवनी स्थित संयुक्त जिला कार्यालय में जगह की कमी या अन्य कारणों से सही ढंग से संचालित नहीं हो पा रहे हैं, उन्हें दल्ली राजहरा में स्थानांतरित किया जा सकता है।
  • समीपवर्ती ग्रामीणों को राहत : दल्ली राजहरा में जिला स्तरीय दफ्तर खुलने से न केवल शहर में चहल-पहल बढ़ेगी, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोगों को भी अपने शासकीय कार्यों के लिए लंबी दूरी तय करने से मुक्ति मिलेगी।
  • व्यापारिक गतिविधियों में तेजी : प्रशासनिक हलचल बढ़ते ही शहर के रियल एस्टेट, परिवहन, फुटकर व्यापार और सेवा क्षेत्र में नए प्राण फुकेंगे, जिससे ढहती हुई अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

जनहित से दूर ‘कापी-पेस्ट’ पत्रकारिता और अवसरवादी नेताओं का सच

शहर की इस दुर्दशा के लिए केवल भ्रष्ट नेता ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि वे मौकापरस्त तत्व भी समान रूप से दोषी हैं जो पत्रकारिता के पवित्र पेशे को कलंकित कर रहे हैं। जिन्हें हिंदी का ‘ह’ लिखना तक ठीक से नहीं आता और जिन्होंने कभी दल्ली राजहरा के उद्धार या जनकल्याण के लिए अपनी कलम उठाना मुनासिब नहीं समझा, वे अब केवल अवैध वसूली और अपनी दुकान चलाने में व्यस्त हैं।

जैसे ही जनहित का यह मुद्दा उठा है, अब यही ‘कापी-पेस्ट’ छाप (नकलचोर) पत्रकार और स्वार्थी नेता इस समाचार को चुराकर, हुबहु कॉपी करके पूरा श्रेय लेने की होड़ में दंगल में कूद पड़ेंगे। ये वही लोग हैं जो अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए दूसरों की मेहनत पर नाम चमकाने का प्रयास करते हैं, जबकि शहर के मुद्दों पर इनकी कलम हमेशा खामोश ही रही है।

अब देखना है कौन सा नेता बनेगा शहर का मसीहा

दल्ली राजहरा की माटी ने हमेशा देश और प्रदेश को कुछ न कुछ दिया ही है, बदले में उसे केवल उपेक्षा मिली है। अब समय आ गया है कि दलीय राजनीति और व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर शहर के अस्तित्व की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय जनता पार्टी का कौन सा कद्दावर और दूरदर्शी नेता इस मरते हुए शहर की चीख सुनता है और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय तक इस क्षेत्र की वाजिब मांग को पहुंचाकर दल्ली राजहरा को उसका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाता है जिससे कि उस नेता का नाम इतिहास में दर्ज होते हुए भावी पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। देश में बीजेपी, प्रदेश में बीजेपी और नगर पालिका राजहरा में भी बीजेपी। मतलब ट्रिपल इंजन की सरकार, किसी को कोई आपत्ति ही नहीं। ‘बालोद-दल्ली राजहरा’ का यह नया स्वरूप न केवल शहर में रौनक वापस लाएगा, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध भविष्य का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

छत्तीसगढ़ में नए जिलों के गठन और दो-तीन शहरों को मिलाकर संयुक्त नाम देने की तर्ज पर बालोद जिले का नाम ‘बालोद – दल्ली राजहरा’ करने की मांग को लेकर कानूनी व प्रशासनिक प्रक्रिया की चर्चा तेज हो गई है। दल्ली राजहरा के बड़े क्षेत्रफल और घनी आबादी को देखते हुए जिले के नाम में संशोधन राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

राज्य में किसी जिले का नाम बदलने या नया नाम जोड़ने के लिए छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 13 के तहत प्रावधान है। इसके लिए प्रक्रिया निम्न चरणों में पूरी की जाती है –

  • प्रस्ताव व रिपोर्ट : स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मांग पर जिला प्रशासन/कलेक्टर द्वारा प्रस्ताव तैयार कर राज्य के राजस्व विभाग को भेजा जाता है।
  • कैबिनेट की मंजूरी : राज्य मंत्रिमंडल (कैबिनेट) से प्रस्ताव पास होना अनिवार्य है।
  • दावे-आपत्ति : राजपत्र (गज़ेट) में प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर जनता से 30 से 60 दिनों के भीतर सुझाव व आपत्तियां मांगी जाती हैं।
  • केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनापत्ति : नाम परिवर्तन के लिए रेलवे, डाक विभाग और सर्वे ऑफ इंडिया की अनापत्ति (एनओसी) ली जाती है।
  • अंतिम अधिसूचना : प्रक्रिया पूरी होने पर सरकार अंतिम अधिसूचना जारी कर नया नाम लागू कर देती है।

Feroz Ahmed Khan

संभाग प्रभारी : दुर्ग

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