विशेष रिपोर्ट : जब ‘कलम’ के प्रहरियों पर ही प्रहार होने लगे!

- गरियाबंद की घटना ने झकझोरा: क्या सच लिखना अब अपराध है?
रायपुर/गरियाबंद: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज खुद को असुरक्षित और अपमानित महसूस कर रहा है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से आई एक तस्वीर ने पूरे प्रदेश के पत्रकार जगत को आक्रोश और आत्ममंथन की स्थिति में डाल दिया है। वर्षों तक समाज की विसंगतियों को अपनी कलम से उजागर करने वाले एक बुजुर्ग पत्रकार को जिस तरह “अपराधी” बनाकर पेश किया गया, उसने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सवाल व्यवस्था से : पत्रकार या गुंडा? – आम जनता और पत्रकार संगठनों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि आखिर एक उम्रदराज व्यक्ति, जिसने जीवन भर जनसमस्याओं को शासन तक पहुँचाया, वह व्यवस्था के लिए “खतरा” कैसे हो गया?
- विरोधाभास: एक तरफ वे लोग हैं जिन पर प्रदेश की शांति भंग करने के गंभीर आरोप हैं, जिन्हें करोड़ों की सुरक्षा और सुविधाएँ दी जा रही हैं।
- हकीकत: दूसरी तरफ जनहित में लिखने वाले पत्रकारों को झूठे मामलों, मानसिक प्रताड़ना और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ रहा है।
यदि आईना (पत्रकारिता) को ही तोड़ने की कोशिश होगी, तो व्यवस्था अपनी असली सूरत कभी नहीं देख पाएगी।”
अभिव्यक्ति की आज़ादी और गहराता संकट – गरियाबंद की इस कार्रवाई ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाना “गुंडागर्दी” की श्रेणी में आएगा? पत्रकारों का कहना है कि पुलिस और प्रशासन की यह कार्यशैली न केवल व्यक्तिगत प्रताड़ना है, बल्कि पूरे लोकतंत्र को कमजोर करने की एक सोची-समझी कोशिश है।
सरकार और प्रशासन से बड़ी मांग – प्रदेश के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री से यह मांग की जा रही है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें। केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
पत्रकार जगत की प्रमुख मांगें:
- बुजुर्ग पत्रकार के खिलाफ की गई कार्रवाई की उच्च स्तरीय जाँच हो।
- पत्रकारों को अपराधी की तरह ट्रीट करना बंद किया जाए।
- पत्रकार सुरक्षा कानून को कड़ाई से लागू किया जाए ताकि कलम निडर होकर चल सके।
डरी हुई कलम, खामोश जनता – इतिहास गवाह है कि जब-जब पत्रकार की आवाज़ दबाई गई है, तब-तब भ्रष्टाचार और तानाशाही फली-फूली है। अगर आज सच लिखना अपराध बन गया, तो आने वाला समय लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय साबित होगा। जनता पूछ रही है—क्या यह वही छत्तीसगढ़ है जहाँ कलम की आज़ादी का सम्मान था?



