संजय पार्क बना ‘कसाईखाना’ : सिस्टम की नींद ने ली 15 बेगुनाह हिरणों की जान…

अम्बिकापुर | विशेष खोजी रिपोर्ट : जहाँ वन्यजीवों को सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, वहीं वे ‘मौत के जाल’ में फंस गए। अम्बिकापुर का संजय पार्क आज अपनी हरियाली के लिए नहीं, बल्कि वन विभाग की उस खूनी लापरवाही के लिए चर्चा में है, जिसने रातों-रात 15 बेगुनाह हिरणों का अस्तित्व मिटा दिया। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के नाम पर पाले जा रहे भ्रष्टाचार और कामचोरी का जीवंत प्रमाण है।
खूनी रात का खौफनाक मंजर : गेट खुला और काल अंदर घुस आया – सूत्रों के अनुसार, उस काली रात संजय पार्क के सुरक्षाकर्मी गहरी नींद में सो रहे थे। बाड़े का दरवाजा खुला छोड़ना आवारा कुत्तों के लिए ‘खुला निमंत्रण’ बन गया।
- हमला : कुत्तों के झुंड ने निहत्थे हिरणों को चारों ओर से घेर लिया।
- चीख-पुकार : बाड़े के भीतर घंटों संघर्ष चला, लेकिन किसी भी गार्ड के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
- नतीजा : 14 हिरणों ने मौके पर ही तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया, जबकि एक हिरण ने अस्पताल की दहलीज पर अपनी अंतिम सांस ली।
कुर्सियां हिलीं : गाज तो गिरी, पर क्या इंसाफ होगा? – चौतरफा दबाव और मीडिया की सक्रियता के बाद विभाग ने आनन-फानन में ‘बलि का बकरा’ ढूंढना शुरू किया है:
- निलंबन : डिप्टी रेंजर समेत 4 कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया है।
- नोटिस : रेंजर को कारण बताओ नोटिस थमाया गया है।
- तालाबंदी : पार्क को फिलहाल जनता के लिए बंद कर ‘सबूतों’ को सहेजने (या छिपाने?) की कोशिश जारी है।
तीखे सवाल : जवाब कौन देगा? –
”जब बाड़े का गेट ही सुरक्षित नहीं, तो करोड़ों का बजट कहाँ जा रहा है? क्या निलंबन उन बेजुबानों को वापस ला सकता है?”
- क्या सीसीटीवी कैमरे सिर्फ शोभा की वस्तु बने हुए थे?
- रात की गश्त (Night Patrolling) के दौरान तैनात कर्मचारी कहाँ गायब थे?
- क्या यह चूक है या फिर किसी गहरी साजिश का हिस्सा?
लापरवाही की कीमत वन्यजीव क्यों चुकाएं? – संजय पार्क की यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि सिस्टम की फाइलों में वन्यजीव सुरक्षित हैं, लेकिन धरातल पर वे ‘राम भरोसे’ हैं। अगर आज सख्त कार्रवाई और बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं हुआ, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे जंगलों और पार्कों में सिर्फ सन्नाटा और कुत्तों का शोर बचेगा।



