वाह रे ‘साहब’! आधी रात को खेत सींचने की सज़ा… सीधा यमराज से मुलाक़ात!…

बलरामपुर : अगर आप समझते हैं कि एसडीएम (SDM) का काम ऑफिस में बैठकर फाइलें निपटाना या जनता की सेवा करना है, तो बधाई हो! आप अब भी आदिम काल के भ्रम में जी रहे हैं। बलरामपुर के कुसमी वाले ‘साहब’ ने प्रशासन की नई परिभाषा गढ़ी है – “प्रशासन मतलब, आधी रात को लाठी लेकर गुंडों के साथ शिकार पर निकलना।”
‘दागी’ बैकग्राउंड, ‘खूनी’ वर्तमान : मिलिए हमारे महानायक करुण डहरिया से। 2019 बैच के इस तेजस्वी अधिकारी का इतिहास इतना ‘उज्जवल’ है कि 2022 में एसीबी (ACB) ने इन्हें 20 हजार की रिश्वत चबाते हुए रंगे हाथों पकड़ा था। नियम तो कहता है कि ऐसे लोगों को घर पर बैठकर पापड़ बेलने चाहिए, लेकिन हमारा सिस्टम तो बड़ा उदार है! इन्हें ‘पुरस्कार’ के तौर पर कुसमी की कुर्सी दे दी गई। शायद सिस्टम को भरोसा था कि जो अधिकारी 20 हजार के लिए बिक सकता है, वह बॉक्साइट के करोड़ों के खेल में ‘मास्टर ब्लास्टर’ साबित होगा।
‘प्राइवेट आर्मी’ और ‘आधी रात का एडवेंचर’ : रविवार की रात, जब दुनिया सो रही थी, तब साहब अपने सरकारी बॉडीगार्ड्स को छोड़कर पूर्व BJYM अध्यक्ष विक्की सिंह और अपने ‘बाउंसर’ दोस्तों के साथ हंसपुर के जंगलों में बॉक्साइट की ‘क्वालिटी’ चेक करने निकले थे।
तभी रास्ते में उन्हें तीन खतरनाक ‘अपराधी’ मिले। अपराध? वे बेचारे 60 साल के बुजुर्ग अपने गेहूं के खेत में पानी डालकर घर लौट रहे थे। अब साहब को लगा होगा कि ये किसान भला खेत में पानी क्यों डाल रहे हैं? इन्हें तो अस्पताल के बिस्तर पर होना चाहिए! बस, फिर क्या था… साहब का ‘प्रशासनिक हाथ’ और उनके गुंडों की लाठियां चलना शुरू हुईं।
‘कुटाई’ से ‘विदाई’ तक का सफर : साहब ने ऐसी ‘कानूनी’ कार्रवाई की कि 60 साल के राम नरेश राम को अस्पताल पहुंचने से पहले ही यमराज के पास फाइल जमा करने भेज दिया। बाकी दो घायलों को यह सबक मिल गया कि अगली बार अगर खेत में पानी डालने जाना हो, तो पहले एसडीएम साहब से ‘बॉक्साइट टैक्स’ और ‘मारपीट परमिट’ ले लेना चाहिए।
नायब तहसीलदार: “मैं तो बस सेल्फी लेने गया था!” – इस पूरी फिल्म में नायब तहसीलदार पारस शर्मा का रोल उस ‘साइड एक्टर’ जैसा है जो विलेन के साथ खड़ा तो रहता है, पर कहता है – “साहब, मैंने तो हाथ भी नहीं लगाया, मैं तो बस ये देख रहा था कि लाठी सही एंगल से पड़ रही है या नहीं।” पुलिस ने भी उन्हें बड़ी मासूमियत से ‘क्लीन चिट’ दे दी है।
विपक्ष का विलाप और सरकार का ‘कोमा’ : कांग्रेस अब इसे ‘जंगलराज’ कह रही है (जैसे उनके राज में वहां रामराज्य की नदियां बह रही थीं)। विधायक देवेंद्र यादव इसे ‘आदिवासियों पर हमला’ बता रहे हैं। और हमारे मुख्यमंत्री जी? उनका वही सदाबहार, पुराना घिसा-पिटा कैसेट बज रहा है – “दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।”
बख्शे तो साहब पहले भी नहीं गए थे मुख्यमंत्री जी, तभी तो रिश्वतखोर होने के बावजूद उन्हें फिर से एसडीएम बनाकर मलाई खाने भेजा गया था!
सुशासन का ‘कबाड़ा’ : फिलहाल साहब और उनकी मंडली जेल में ‘हवा’ खा रही है। बॉक्साइट की तस्करी जारी रहेगी, चक्काजाम खत्म हो जाएगा, और एक गरीब की चिता की राख ठंडी होते ही प्रशासन फिर से किसी नए ‘शिकार’ की तलाश में निकलेगा।
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