दंतेवाड़ा : सरकारी गाड़ी बनी ‘मयखाना’, नशे में धुत ड्राइवर और चपरासी ने डिवाइडर पर चढ़ाई तहसीलदार की कार…

दंतेवाड़ा। जिले से प्रशासनिक अनुशासन को शर्मसार करने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। कटेकल्याण में पदस्थ महिला तहसीलदार की सरकारी गाड़ी (बोलेरो) अंबेडकर पार्क के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई। यह हादसा सामान्य नहीं था, बल्कि सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और नियमों की धज्जियां उड़ाने का नतीजा था।
घटनाक्रम : महुआ शराब के नशे में ‘रफ्तार का कहर’ – प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, तहसीलदार के नाम वाली बोलेरो गाड़ी अनियंत्रित होकर सड़क के बीचों-बीच लगे डिवाइडर से जा टकराई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि गाड़ी का अगला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। गनीमत रही कि उस वक्त सड़क पर अन्य कोई वाहन या राहगीर नहीं था, वरना बड़ी जनहानि हो सकती थी।
जब स्थानीय लोग मदद के लिए पहुंचे, तो गाड़ी के अंदर का नजारा देखकर दंग रह गए। वाहन चला रहा ड्राइवर और उसमें सवार चपरासी (प्यून) दोनों पूरी तरह नशे में धुत थे। ग्रामीणों के घेराव और पूछताछ के बाद दोनों ने कैमरे के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने बस स्टैंड के पास महुआ शराब पी थी।
प्रशासनिक अनुशासन पर उठे 3 तीखे सवाल – यह घटना केवल एक एक्सीडेंट नहीं है, बल्कि सिस्टम की खामियों को उजागर करती है :
- सरकारी वाहन का निजी इस्तेमाल : तहसीलदार गाड़ी में मौजूद नहीं थीं। ऐसे में सवाल उठता है कि उनके अधीनस्थ कर्मचारी सरकारी वाहन लेकर शराब पीने क्यों और कैसे गए? क्या लॉग-बुक में इस मूवमेंट का कोई रिकॉर्ड है?
- दबंगई और लापरवाही : तहसीलदार के नाम की नेमप्लेट लगी गाड़ी का इस्तेमाल शराब के नशे में करना यह दर्शाता है कि कर्मचारियों के मन में कानून और अपने वरिष्ठ अधिकारियों का कोई खौफ नहीं है।
- सुरक्षा और जिम्मेदारी : एक ओर प्रशासन सड़क सुरक्षा अभियानों पर लाखों खर्च करता है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार विभाग के कर्मचारी ही नशे में वाहन चलाकर लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं।
“सरकारी गाड़ी जनता के टैक्स के पैसे से चलती है, कर्मचारियों के निजी शौक और नशेबाजी के लिए नहीं। इस मामले में केवल ड्राइवर ही नहीं, बल्कि वाहन प्रभारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।” – स्थानीय निवासी
अब तक की कार्रवाई और वर्तमान स्थिति : सूचना मिलने पर स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और वाहन को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है। हालांकि, इस पूरे मामले पर प्रशासनिक अमले की चुप्पी कई संदेहों को जन्म दे रही है। खबर लिखे जाने तक दोषियों पर किसी कड़ी विभागीय कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि कलेक्टर दंतेवाड़ा इस ‘अनुशासनहीनता’ पर क्या कड़ा रुख अपनाते हैं। क्या केवल ड्राइवर पर गाज गिरेगी या उस ‘सिस्टम’ को भी सुधारा जाएगा जिसने सरकारी गाड़ी को शराबियों का अड्डा बनने दिया?

