रायपुर

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में ‘सर्जरी’ की तैयारी : दीपक बैज की विदा! क्या उमेश पटेल का ‘युवा कार्ड’ काटेगा टीएस बाबा का ‘अनुभव’?…

रायपुर/दिल्ली: छत्तीसगढ़ कांग्रेस में बड़े उलटफेर की पटकथा लिखी जा चुकी है। हार के सदमे से उबरने की कोशिश कर रही पार्टी अब संगठन में ‘आमूलाग्र परिवर्तन’ (Major Overhaul) के मूड में है। दिल्ली के सियासी गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज की कुर्सी खतरे में है और आलाकमान दो चेहरों-  उमेश पटेल और टीएस सिंहदेव के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

उमेश पटेल : ‘भूपेश फैक्टर’ और युवाओं की हुंकार – पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी और पूर्व मंत्री उमेश पटेल का नाम इस रेस में सबसे आगे बताया जा रहा है। हाल ही में उनका दिल्ली दौरा महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि ‘शक्ति प्रदर्शन’ और ‘लॉबिंग’ का हिस्सा माना जा रहा है।

  • कार्यकर्ताओं का तर्क : संगठन के निचले स्तर पर यह मांग उठ रही है कि पार्टी को अब ‘ओल्ड गार्ड’ से बाहर निकलकर ‘युवा नेतृत्व’ को मौका देना चाहिए।
  • साफ छवि का दांव : उमेश पटेल की छवि बेदाग है, जिसे पार्टी बीजेपी के भ्रष्टाचार विरोधी नैरेटिव के खिलाफ ढाल बनाना चाहती है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि पटेल गुटबाजी के ‘पुराने जख्मों’ को भरने में सक्षम हैं।

टीएस सिंहदेव : ‘चाणक्य’ की वापसी या गुटबाजी का डर? – पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव (बाबा) एक बार फिर संगठन की कमान संभालने के इच्छुक दिख रहे हैं। 2018 की जीत के मुख्य शिल्पकारों में से एक रहे बाबा अपनी रणनीतिक सूझबूझ के लिए विख्यात हैं।

  • ताकत : रमन सरकार के 15 सालों के खिलाफ उन्होंने जो माहौल बनाया था, उसे आज भी कार्यकर्ता याद करते हैं।
  • कमजोरी : सिंहदेव का बेबाकपन अक्सर पार्टी के लिए ‘मुसीबत’ बन जाता है। ‘ढाई-ढाई साल’ के फार्मूले पर उनके बार-बार आने वाले बयानों ने पार्टी को बैकफुट पर धकेला है। दिल्ली दरबार इस बात को लेकर सशंकित है कि क्या बाबा के आने से गुटबाजी खत्म होगी या और भड़केगी?

अंदरूनी कलह : जीत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा – छत्तीसगढ़ कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्मन बीजेपी नहीं, बल्कि उसकी अपनी ‘गुटबाजी’ है। 2018 में जो भूपेश-टीएस की ‘जय-वीरू’ की जोड़ी थी, वह सत्ता में आते ही बिखर गई। खबर है कि कार्यकर्ता अब इस ‘शीत युद्ध’ से थक चुके हैं। वे चाहते हैं कि ऐसा अध्यक्ष बने जो:

  • कड़े फैसले ले सके: अनुशासनहीनता पर लगाम लगाए।
  • बीजेपी की काट खोजे: विष्णुदेव साय सरकार को सड़क से सदन तक घेरे।
  • 2028 का रोडमैप तैयार करे: बिना किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के संगठन को एकजुट करे।

दिल्ली दरबार का कठिन फैसला – एक तरफ उमेश पटेल के रूप में ‘भविष्य’ है, तो दूसरी तरफ सिंहदेव के रूप में ‘अनुभवी अतीत’। उमेश पटेल के बहाने भूपेश बघेल अपना प्रभाव बरकरार रखना चाहते हैं, वहीं टीएस बाबा अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने की कोशिश में हैं। दोनों ही नेताओं ने मीडिया से कहा है कि वे “पार्टी का आदेश मानेंगे”, लेकिन पर्दे के पीछे की खींचतान बता रही है कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राह आसान नहीं है।

सियासी सवाल : क्या एक नया चेहरा कांग्रेस के बिखरे हुए कुनबे को एक कर पाएगा, या ‘वर्चस्व की जंग’ में पार्टी एक और मौका गंवा देगी?

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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