विशेष रिपोर्ट : रायपुर प्रेस क्लब चुनाव – क्या इस बार पत्रकारिता जीतेगी या राजनीति?…

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इन दिनों प्रेस क्लब चुनाव की सरगर्मियां तेज हैं। लेकिन यह चुनाव केवल हार-जीत का आंकड़ा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के भविष्य की दिशा तय करने वाला मोड़ साबित हो रहा है। सोशल मीडिया से लेकर प्रेस क्लब की सीढ़ियों तक केवल एक ही चर्चा है – क्या प्रेस क्लब अपनी खोई हुई गरिमा वापस पा सकेगा?
इसी बीच, प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सुनील नामदेव की एक मर्मस्पर्शी और तीखी अपील ने चुनावी माहौल में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने सीधे तौर पर आगाह किया है कि प्रेस क्लब अब “मनोरंजन का अड्डा” नहीं, बल्कि “संघर्ष का औजार” बनना चाहिए।
सत्ता की चाशनी या संघर्ष की विरासत? – रिपोर्ट के मुताबिक, बीते कुछ वर्षों में प्रेस क्लब की भूमिका पर कई सवाल खड़े हुए हैं। आरोप लगते रहे हैं कि यह संस्था पत्रकारों के हितों की रक्षा करने के बजाय राजनीतिक दलों की शरणस्थली बनती जा रही है। नामदेव ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि प्रेस क्लब का गठन इसलिए हुआ था ताकि जब किसी पत्रकार पर झूठा मुकदमा हो या उसे सत्ता की तरफ से प्रताड़ित किया जाए, तो वह अकेला महसूस न करे।
“प्रेस क्लब केवल चाय और फोटो सेशन के लिए नहीं बना है। यह सत्ता से सवाल पूछने वाले उस पत्रकार की ढाल है जिसे व्यवस्था चुप कराना चाहती है।” – सुनील नामदेव
मूक दर्शक बनाम सक्रिय रक्षक -वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि पिछले कुछ समय में प्रेस क्लब ‘मूक दर्शक’ की भूमिका में आ गया है। जहाँ पत्रकारों पर बढ़ते हमलों और मुकदमों के खिलाफ सामूहिक आवाज उठनी चाहिए थी, वहाँ समझौतों की राजनीति हावी रही। इस बार का चुनाव तीन मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित होता नजर आ रहा है:
- स्वतंत्रता बनाम सत्ता की गुलामी : क्या नेतृत्व सत्ता के दबाव में काम करेगा या पत्रकारों के लिए लड़ेगा?
- चरित्र बनाम चेहरा : मतदाता केवल चमक-धमक देखकर वोट देंगे या उम्मीदवार के पिछले संघर्षों को तवज्जो देंगे?
- सुरक्षा की गारंटी : क्या प्रेस क्लब थानों और कोर्ट के चक्कर काट रहे पत्रकारों का साथ देगा?
वोटर के सामने ‘अस्तित्व’ की चुनौती – रायपुर के पत्रकार साथियों से यह अपील की गई है कि वे इस बार किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता को चुनें। यह चुनाव “पत्रकार बनाम सौदागर” की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। सुनील नामदेव की इस अपील ने उन मतदाताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है जो अब तक केवल औपचारिक रूप से मतदान करते आए थे।
रायपुर प्रेस क्लब का आगामी चुनाव इस बात का लिटमस टेस्ट होगा कि छत्तीसगढ़ का पत्रकार समाज कितना जागरूक है। क्या इस बार ‘पत्रकारिता के सौदागर’ बाहर होंगे और वास्तविक ‘संघर्ष’ करने वाले चेहरे नेतृत्व संभालेंगे? इसका फैसला आने वाले कुछ दिनों में रायपुर के पत्रकार अपने वोट से करेंगे।
वक्त आ गया है कि फैसला सही हो, क्योंकि आज की चुप्पी कल की बड़ी मुसीबत बन सकती है।




