तमनार में ‘जनशक्ति’ का ऐतिहासिक विजयनाद : ग्रामीणों की फौलादी एकता के आगे नतमस्तक हुआ कॉर्पोरेट, चुकाने पड़े 7 करोड़ रुपये…

• मुड़ागांव के ग्रामीणों ने रचा इतिहास: जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में मिली अभूतपूर्व जीत…
• छत्तीसगढ़ में पहली बार: वनोपज के नुकसान की भरपाई के लिए कंपनी ने टेके घुटने…
• 7 करोड़ का मुआवजा: यह महज रकम नहीं, संगठित संघर्ष का प्रमाण है…
रायगढ़। जिले के तमनार क्षेत्र अंतर्गत मुड़ागांव की माटी ने आज यह सिद्ध कर दिया है कि अगर इरादे फौलादी हों और समाज एकजुट हो, तो बड़े से बड़े औद्योगिक घरानों को भी झुकना पड़ता है। वन भूमि पर पेड़ों की कटाई और छीनी जा रही आजीविका के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा छेड़ा गया महा-संग्राम एक ऐतिहासिक और सुखद अंजाम तक पहुँचा। अडानी समूह और महाजेको (MAHAGENCO) प्रबंधन को ग्रामीणों के संगठित संघर्ष के आगे घुटने टेकने पड़े और वनोपज (तेंदूपत्ता, महुआ, चिरौंजी) के नुकसान के एवज में 7 करोड़ रुपये की भारी-भरकम मुआवजा राशि चुकानी पड़ी।
छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह पहला अवसर है जब कॉरपोरेट जगत को वन भूमि पर उगने वाले वनोपज के नुकसान की नकद भरपाई करनी पड़ी है। यह जीत पूरी तरह से ग्रामीणों के अदम्य साहस की देन है।
रोजी-रोटी पर संकट और संघर्ष का शंखनाद : मुड़ागांव के वनवासियों के लिए जंगल केवल पेड़ों का झुरमुट नहीं, बल्कि उनकी रसोई और जीवन की डोर है। जब विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई शुरू हुई, तो ग्रामीणों को अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा।
बिना सहमति और मुआवजे के जंगल उजाड़ने की कोशिशों के खिलाफ पूरा गांव एक दीवार बनकर खड़ा हो गया। ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया कि उनकी आजीविका (वनोपज) के नुकसान की भरपाई किए बिना एक भी पेड़ नहीं कटने दिया जाएगा। देखते ही देखते यह विरोध एक जन-आंदोलन में बदल गया, जिसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।
प्रबंधन को माननी पड़ीं शर्तें : आंदोलन की धार इतनी तेज थी कि प्रशासन और कंपनी प्रबंधन को लगातार वार्ता की मेज पर आना पड़ा। ग्रामीणों की दलील साफ थी- “जंगल हमारा बैंक है, इसे काटोगे तो उसका ब्याज चुकाना होगा।”
लगातार धरने, प्रदर्शन और तार्किक संवाद के आगे आखिरकार अडानी और महाजेको प्रबंधन को ग्रामीणों की जायज मांगों को स्वीकार करना पड़ा। 7 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि पर सहमति बनी और चेक के माध्यम से इसका वितरण किया गया।
पूरे प्रदेश के लिए एक नज़ीर (मिसाल) : मुआवजा मिलने के बाद ग्रामीणों के चेहरों पर संतोष और जीत की चमक साफ देखी जा सकती है। उन्होंने इस जीत को अपनी ‘सामूहिक एकता’ का परिणाम बताया।
प्रशासनिक अधिकारियों ने भी माना कि ग्रामीणों का यह आंदोलन अनुशासित और तर्कसंगत था, जिसने शांतिपूर्ण समाधान का रास्ता खोला। मुड़ागांव की यह घटना अब पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक केस स्टडी बन गई है कि कैसे बिना हिंसा के, केवल एकजुटता और संवाद के दम पर अपने अधिकारों को सुरक्षित किया जा सकता है।
मुड़ागांव ने दिखा दिया है कि लोकतंत्र में असली ताकत ‘जनता’ के पास है। 7 करोड़ की यह जीत उन सभी के लिए एक सबक है जो ग्रामीणों की आवाज को कमजोर समझने की भूल करते हैं।




