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दिल्ली फिर दहली : लाल किले के पास हुआ भीषण धमाका, 10 लोगों की मौत – एनआईए और एनएसजी जांच में जुटीं…

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली एक बार फिर दहशत के साए में है। सोमवार शाम लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर-1 के पास खड़ी एक कार में जोरदार विस्फोट हुआ, जिससे पूरा क्षेत्र थर्रा उठा। इस धमाके में 10 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हैं।

धमाका इतना शक्तिशाली था कि आसपास खड़ी गाड़ियों में आग लग गई, दुकानों की खिड़कियों के शीशे टूट गए और क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई। मौके पर दमकल विभाग, दिल्ली पुलिस, एनएसजी और एनआईए की टीमें पहुंचकर राहत और जांच कार्य में जुट गई हैं।

घटनास्थल पर अफरा-तफरी का माहौल : प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, एक कार से तेज आवाज के साथ आग की लपटें उठीं और कुछ ही क्षणों में पास खड़ी तीन अन्य गाड़ियाँ भी आग की चपेट में आ गईं। एक दुकानदार ने बताया, “धमाका इतना तेज़ था कि ज़मीन तक हिल गई। कुछ पल के लिए लगा मानो भूकंप आया हो।”

दमकल विभाग की चार गाड़ियों ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। घायलों को पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मांगी रिपोर्ट, NCR में हाई अलर्ट : घटना की जानकारी मिलते ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एनआईए, आईबी प्रमुख और दिल्ली पुलिस आयुक्त से त्वरित रिपोर्ट मांगी है। दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। साथ ही, उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी सीमा क्षेत्रों और प्रमुख मार्गों पर वाहन चेकिंग बढ़ा दी है।

प्रारंभिक जांच में विस्फोटक की प्रकृति का पता नहीं चल सका है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इसे आतंकी साजिश की आशंका मानकर जांच कर रही हैं। ध्यान देने योग्य है कि इसी दिन फरीदाबाद में 350 किलो आरडीएक्स बरामद हुआ था, जिससे यह आशंका और गहराती जा रही है कि दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध हो सकता है।

1996 से 2025 तक – धमाकों की पीड़ित राजधानी : लाल किले के पास हुआ यह धमाका दिल्ली की उस काली स्मृति को दोबारा जगा देता है, जब राजधानी बार-बार आतंकी हमलों का निशाना बनी।

  • 1996: लाजपत नगर बम धमाका — 16 मौतें, 40 घायल।
  • 1997: करोल बाग और रानी बाग में सिलसिलेवार विस्फोट, तीन मौतें, दर्जनों घायल।
  • 2005: सरोजिनी नगर, पहाड़गंज और गोविंदपुरी में दिवाली से पहले तीन धमाके — 60 मौतें, 100 से अधिक घायल।
  • 2008: कनॉट प्लेस और महरौली धमाके — 24 मौतें, 100 घायल।
  • 2011: दिल्ली हाईकोर्ट परिसर में धमाका — 17 मौतें, 76 घायल।
  • 2025: लाल किले के पास फिर वही भयावह दृश्य, वही अनुत्तरित सवाल।

सुरक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल : दिल्ली जैसे अत्याधुनिक और संवेदनशील शहर में, जहाँ हर चौराहे पर निगरानी कैमरे लगे हैं, वहाँ इस तरह का विस्फोट होना सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीकी निगरानी पर्याप्त नहीं, बल्कि जन-जागरूकता और स्थानीय खुफिया नेटवर्क को भी सशक्त बनाना आवश्यक है।

लाल किले की प्रतीकात्मकता और सुरक्षा की चुनौती : लाल किला केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता और संप्रभुता का प्रतीक है। ऐसे स्थान के निकट धमाका होना, न केवल सुरक्षा एजेंसियों की दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आतंकवादी मानसिकता आज भी सक्रिय है।

अब ज़रूरत है नई रणनीति की : बीते तीन दशकों में दिल्ली ने अनेक बार आतंक का सामना किया है, परंतु प्रत्येक धमाके के बाद एक ही प्रश्न रह जाता है –“कब तक?”

अब समय आ गया है कि सरकार, सुरक्षा एजेंसियाँ और नागरिक समाज मिलकर ऐसी नीति तैयार करें जो न केवल आतंक की जड़ों को समाप्त करे, बल्कि नागरिकों के भीतर सुरक्षा और विश्वास की भावना भी सुदृढ़ करे।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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