विशेष रिपोर्ट : त्यौहारों में भी मदिरा दुकानों के कर्मचारियों से बंधुआ मजदूरी? बालोद जिले में श्रम नियमों की धज्जियां

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। राज्य शासन द्वारा भले ही मदिरा दुकानों के माध्यम से राजस्व अर्जन की व्यवस्था बनाई गई हो, लेकिन बालोद जिले व अन्य जिलों की शासकीय देशी व विदेशी मदिरा (कंपोजिट) दुकानों में कार्यरत प्लेसमेंट कर्मचारियों के साथ श्रम अधिकारों का खुला उल्लंघन देखने को मिल रहा है। प्रमुख और विशेष हिन्दू त्यौहारों पर जहाँ पूरा समाज परिवार के साथ पर्व मनाता है, वहीं इन दुकानों में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को एक दिन का अवकाश तक नसीब नहीं हो रहा है।
तथ्यों के अनुसार, आबकारी विभाग द्वारा घोषित ‘शुष्क दिवस’ की सीमित सूची के आड़ में प्लेसमेंट एजेंसियां और स्थानीय आबकारी अधिकारी कर्मचारियों का निरंतर शोषण कर रहे हैं।

कानून क्या कहता है और धरातल पर क्या हो रहा है?
कानूनी व प्रशासनिक मानकों के मुताबिक, किसी भी वाणिज्यिक या शासकीय प्रतिष्ठान में कार्यरत कर्मचारियों के लिए ‘छत्तीसगढ़ दुकान एवं स्थापना अधिनियम’ और ‘न्यूनतम वेतन कानून’ लागू होते हैं जिसमें सप्ताहिक एवं त्यौहारी अवकाश का अधिकार : यदि कोई प्रतिष्ठान 365 दिन भी संचालित होता है, तब भी ठेकेदार/प्लेसमेंट एजेंसी को अनिवार्य रूप से ‘रिलीवर स्टाफ’ रखकर प्रत्येक कर्मचारी को सप्ताह में 1 दिन का अवकाश तथा त्यौहारों पर छुट्टियां या उसके एवज में दोगुना ओवरटाइम अलाउंस देना अनिवार्य है।
- बिना विश्राम काम कराना गैर-कानूनी : बालोद जिले की दुकानों में प्लेसमेंट ठेकेदारों द्वारा अतिरिक्त रिलीवर कर्मचारियों की तैनाती न करके मौजूदा कर्मचारियों से बिना किसी स्थानापन्न अवकाश के लगातार काम कराया जा रहा है, जो कि बंधुआ श्रम और श्रम कानूनों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
जिम्मेदार आबकारी अधिकारियों और एजेंसियों पर कस सकता है कानूनी शिकंजा
विभागीय सूत्रों और श्रम विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस अव्यवस्था में तत्काल सुधार नहीं किया गया, तो आबकारी विभाग और संबंधित प्लेसमेंट वेंडर बड़ी कानूनी मुश्किल में फँस सकते हैं जिसमें आबकारी निगम (सीएसएमसीएल) की टेंडर शर्तों का उल्लंघन : प्लेसमेंट एजेंसियों को दिए गए टेंडर अनुबंध में कर्मचारियों के श्रम अधिकारों का पालन करना अनिवार्य शर्त होती है। लगातार शिकायत मिलने पर एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करने और उसकी जमा राशि जप्त करने का स्पष्ट प्रावधान है।
- श्रम न्यायालय (लेबर कोर्ट) में सीधी कार्यवाही : यदि कर्मचारी संघ या कोई जागरूक नागरिक श्रम आयुक्त (लेबर कमिश्नर) के समक्ष शिकायत दर्ज कराता है, तो श्रम निरीक्षक (लेबर इंस्पेक्टर) द्वारा औचक निरीक्षण कर ठेकेदार और संबंधित आबकारी अधिकारी के खिलाफ ‘औद्योगिक विवाद अधिनियम’ के तहत मामला दर्ज कराया जा सकता है। मानवाधिकार एवं बायोमीट्रिक जांच की तलवार : दुकानों में लॉग-बुक और बायोमीट्रिक हाजिरी के मिलान से यह चुटकियों में साबित हो जाएगा कि कर्मचारियों से बिना साप्ताहिक और त्यौहारी अवकाश के कार्य लिया गया है।

सुचारू व्यवस्था हेतु अति-शीघ्र आवश्यक कदम
इस अवैध व्यवस्था और तुगलकी चलन को तुरंत समाप्त करने के लिए आबकारी विभाग एवं प्लेसमेंट कंपनी को निम्नलिखित सुधार लागू करने होंगे।
- रोस्टर और रिलीवर प्रणाली लागू हो : जिला आबकारी अधिकारी बालोद तुरंत सभी कंपोजिट दुकानों पर रोस्टर सिस्टम लागू करवाएं, ताकि कर्मचारियों को बारी-बारी से त्यौहारों एवं सप्ताह में एक दिन का अनिवार्य विश्राम मिल सके।
- ओवरटाइम का सीधा भुगतान : त्यौहारों के दिन काम करने वाले कर्मचारियों को उनके बैंक खातों में पारदर्शी रूप से अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि/ओवरटाइम का भुगतान किया जाए।
- पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र : दुकानों में श्रम विभाग और आबकारी निगम का टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित किया जाए, जिससे कर्मचारी बिना किसी डर के अपनी शिकायत दर्ज करा सकें।
“राजस्व संग्रह शासन का लक्ष्य हो सकता है, लेकिन किसी भी एजेंसी को भारतीय श्रम कानूनों और मानवीय अधिकारों को कुचलने का अधिकार नहीं है। बालोद जिले में यदि प्लेसमेंट एजेंसियां अपनी मनमानी से बाज नहीं आती हैं, तो मामला श्रम न्यायालय से लेकर शासन के उच्च स्तर तक पहुंचेगा।”

बालोद जिले की मदिरा दुकानों में श्रम कानूनों का खुला उल्लंघन : पर्वों के दिन भी अवकाश से वंचित रखे जा रहे प्लेसमेंट कर्मचारी
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में शासन की मदिरा दुकानों का संचालन करने वाली प्लेसमेंट एजेंसियों और लापरवाह आबकारी अधिकारियों की मनमानी चरम पर पहुँच चुकी है। एक तरफ जहाँ पूरा देश और समाज अपनी परिवार के साथ दीपावली, होली, रक्षाबंधन और अन्य प्रमुख धार्मिक तथा राष्ट्रीय पर्वों पर खुशियां मनाता है और अवकाश का आनंद लेता है, वहीं दूसरी ओर बालोद जिले की शासकीय देशी व विदेशी मदिरा (कंपोजिट) दुकानों में ठेके पर कार्यरत इन गरीब और बेबस प्लेसमेंट कर्मचारियों के हिस्से में केवल दोहरी प्रताड़ना और निराशा ही आती है। स्थिति यह है कि विशेष हिन्दू त्यौहारों और अन्य पावन पर्वों के दिन भी इन कर्मचारियों को एक दिन का साधारण अवकाश तक नसीब नहीं हो रहा है, जिससे उनकी पारिवारिक और सामाजिक जिंदगी पूरी तरह से प्रभावित हो रही है।
आबकारी विभाग द्वारा प्रशासनिक स्तर पर केवल कुछ चुनिंदा ‘शुष्क दिवस’ यानी ड्राय डे की सीमित सूची जारी की जाती है, जिसके आधार पर दुकानें बंद रहती हैं। परंतु अधिकांश प्रमुख त्यौहारों पर जब दुकानें खुली रहती हैं, तब इन दुकानों पर तैनात प्लेसमेंट कंपनियाँ और उनके ठेकेदार मानवीय संवेदनाओं और श्रम कानूनों को ताक पर रखकर कर्मचारियों से लगातार जबरन कार्य करवाते हैं। कायदे और कानून के मुताबिक, यदि कोई प्रतिष्ठान वर्ष के 365 दिन भी खुला रहता है, तब भी प्रत्येक कर्मचारी को सप्ताह में कम से कम एक दिन का अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश मिलना चाहिए। इसके अलावा यदि किसी कर्मचारी से किसी राष्ट्रीय या विशेष पर्व के दिन ड्यूटी ली जाती है, तो उसे या तो वैकल्पिक अवकाश दिया जाना चाहिए या फिर उस दिन के कार्य के लिए नियमानुसार दोगुना ओवरटाइम वेतन उसके बैंक खाते में मिलना अनिवार्य है।
परंतु बालोद जिले की जमीनी हकीकत इन तमाम कानूनी प्रावधानों के बिल्कुल विपरीत है। यहाँ की मदिरा दुकानों में प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा किसी भी प्रकार का अतिरिक्त ‘रिलीवर स्टाफ’ यानी अल्टरनेटिव कर्मचारी नियुक्त नहीं किया जाता है। एक ही मूल स्टाफ पर लगातार काम का भारी दबाव बनाया जाता है। यदि कोई कर्मचारी अपनी किसी पारिवारिक मजबूरी या त्यौहार के पावन अवसर पर एक दिन की छुट्टी मांगता है, तो उसे नौकरी से बाहर निकालने की धमकी दी जाती है या फिर उसकी सैलरी से पैसे काट लिए जाते हैं। ठेकेदारों की इस तानाशाही और तुगलकी कार्यशैली ने इन कर्मचारियों की स्थिति को एक तरह से आधुनिक ‘बंधुआ मजदूरों’ जैसी बना कर रख दी है, जहाँ वे अपनी आवाज भी बुलंद करने से डरते हैं।
इस गंभीर मामले को लेकर जब श्रम कानून के विशेषज्ञों और जानकारों से बात की गई, तो उनका स्पष्ट रूप से यह कहना है कि आबकारी विभाग और प्लेसमेंट एजेंसियों की यह कार्यशैली सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ दुकान एवं स्थापना अधिनियम तथा न्यूनतम वेतन अधिनियम का खुला उल्लंघन है। छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी आबकारी निगम द्वारा प्लेसमेंट एजेंसियों को जो टेंडर और अनुबंध दिए जाते हैं, उनमें साफ तौर पर यह शर्त शामिल होती है कि कंपनी को अपने सभी कर्मचारियों के श्रम अधिकारों और कल्याण का पूरा ध्यान रखना होगा। यदि कोई एजेंसी ऐसा नहीं करती है, तो आबकारी विभाग को पूर्ण अधिकार है कि वह उस कंपनी की अमानत राशि यानी ईएमडी को जप्त करते हुए उसे तुरंत ब्लैकलिस्ट कर दे।
इसके अतिरिक्त, यदि कोई पीड़ित कर्मचारी या मजदूर संगठन श्रम आयुक्त के समक्ष इसकी औपचारिक शिकायत दर्ज कराता है, तो श्रम निरीक्षक द्वारा दुकानों के बायोमीट्रिक और मैनुअल उपस्थिति रजिस्टरों की गहन जांच कर औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत संबंधित ठेकेदार और दोषी अधिकारियों के खिलाफ श्रम न्यायालय में सीधे कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। बालोद जिले के कई प्रबुद्ध नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक लोगों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से पुरजोर मांग की है कि इस अवैध और अमानवीय चलन को तुरंत रोका जाए। सभी मदिरा दुकानों में तत्काल प्रभाव से रोस्टर प्रणाली और रिलीवर स्टाफ की व्यवस्था लागू की जाए, ताकि इन मेहनतकश कर्मचारियों को भी अपने परिवार के साथ पर्व मनाने का अधिकार मिल सके और श्रम कानूनों का सही रूप से पालन सुनिश्चित हो सके।




