किसानों की आय बढ़ाने का नया फार्मूला! लैलूंगा के 100 किसानों को मिला धनियाँ बीज, अब खेतों में खुशहाली की उम्मीद या सरकारी योजनाओं का एक और आंकड़ा?…

रायगढ़। किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकारी मंचों से बड़े-बड़े दावे तो खूब सुनाई देते हैं, लेकिन खेती की जमीनी चुनौतियां आज भी किसानों के सामने खड़ी हैं। इसी बीच कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, रायगढ़ ने लैलूंगा विकासखंड के 100 से अधिक किसानों को उन्नत धनियाँ बीज वितरित कर मसाला खेती की दिशा में एक पहल की है। अब सवाल यह है कि बीज वितरण की यह पहल किसानों की आर्थिक तस्वीर कितनी बदलेगी?
कृषि महाविद्यालय में संचालित अखिल भारतीय समन्वित मसाला अनुसंधान परियोजना की आदिवासी उप योजना (टीएसपी) के तहत किसानों को महाविद्यालय द्वारा विकसित ‘छत्तीसगढ़ श्री चंद्रहासिनी धनियाँ’ का आधार बीज दिया गया। प्रत्येक किसान को 5 किलो बीज उपलब्ध कराया गया है।
बीज थमाकर जिम्मेदारी खत्म नहीं होती! – शासकीय उद्यान रोपणी, लैलूंगा में आयोजित कार्यक्रम में परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डॉ. ए.के. सिंह ने किसानों को धनियाँ की वैज्ञानिक खेती, बुवाई, गुड़ाई, रोग नियंत्रण और बेहतर उत्पादन की तकनीकों की जानकारी दी। ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी श्रीमती कविता पैंकरा और श्री संदीप केरकेट्टा ने मसाला फसलों की खेती अपनाकर आय बढ़ाने का आह्वान किया।
लेकिन खेती की असली परीक्षा खेत में होती है, मंच पर दिए गए भाषणों में नहीं। किसानों को उन्नत बीज देने के साथ-साथ समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन, फसल में लगने वाले रोगों से बचाव, उत्पादन की लागत और उपज के उचित बाजार भाव की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
उत्पादन के बाद बाजार की गारंटी कौन देगा? – किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ फसल उगाना नहीं, बल्कि उसे लाभकारी कीमत पर बेचना भी है। यदि धनियाँ का उत्पादन तो हो जाए, लेकिन बाजार में उचित कीमत न मिले तो आय बढ़ाने का दावा आखिर कितना सार्थक होगा?
कार्यक्रम में जिला पंचायत रायगढ़ के उपाध्यक्ष दीपक सिदार सहित ललित यादव, सौभागी गुप्ता, चरणसिंह नाग और अमरसाय नाग समेत अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
अब असली रिपोर्ट खेतों से आनी चाहिए! – 100 से अधिक किसानों को बीज वितरण निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहल है। मगर इसकी सफलता का पैमाना वितरित किए गए बीजों की संख्या नहीं, बल्कि किसानों के खेतों में हुई पैदावार, उनकी लागत में बचत और बिक्री से हुई वास्तविक आमदनी होनी चाहिए।
किसानों को बीज देकर तस्वीर खिंचवाना आसान है, लेकिन उनकी फसल को बाजार तक पहुंचाकर लाभ दिलाना असली चुनौती है। अब देखना होगा कि ‘छत्तीसगढ़ श्री चंद्रहासिनी धनियाँ’ लैलूंगा के किसानों के लिए वास्तव में खुशहाली का बीज साबित होती है या यह पहल भी सरकारी उपलब्धियों के आंकड़ों तक ही सीमित रह जाती है।




