“जिसने लंबी उम्र की दुआ मांगी, उसी की अर्थी को दिया कंधा” : राजनांदगांव में इलाज के नाम पर मौत का खेल

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
रायपुर/राजनांदगांव/बालोद। करवा चौथ का पर्व भारतीय संस्कृति में अखंड सुहाग, अटूट प्रेम और लंबी उम्र की कामना का प्रतीक माना जाता है। इस पावन दिन हर सुहागन अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती है और चंद्रमा के दीदार के साथ अपने दांपत्य जीवन की खुशियों को सेलिब्रेट करती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में इस बार करवा चौथ का यह पर्व एक परिवार के लिए ऐसा कोहराम लेकर आया, जिसकी टीस शायद कभी कम नहीं होगी। जिस पत्नी को देखकर पति को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशियां मिलनी थीं, उसी जीवनसंगिनी की अर्थी को कंधा देकर एक बेबस पति (दीपक जोशी) ने नम आंखों से उसका दाह संस्कार किया। महज एक सामान्य सिरदर्द और कमजोरी के इलाज की आस में राजनांदगांव के पारख नर्सिंग होम पहुंची 28 वर्षीय बैसाखीन जोशी की इस दर्दनाक मौत ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, संवेदनहीनता और चिकित्सकीय लापरवाही पर बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इलाज के नाम पर मनमानी और पैसे ऐंठने का गंभीर आरोप
प्राप्त विवरण के अनुसार, 26 अक्टूबर को बैसाखीन जोशी को अत्यधिक सिरदर्द और खून की कमी की शिकायत के बाद बड़े भरोसे के साथ पारख नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। परिजनों के सपने और उम्मीदें चकनाचूर तब हो गए जब सामान्य उपचार के लिए आया यह अस्पताल उनके हंसते-खेलते परिवार के लिए मौत का कुआं साबित हुआ। पीड़ित परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने बेहतर इलाज का भरोसा देकर पहले तो करीब 22 हजार रुपये खर्च करवा लिए, लेकिन मरीज की हालत में सुधार होने के बजाय लगातार गिरावट आती गई। जब स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गई, तब अस्पताल ने आनन-फानन में मरीज को मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। हैरानी की बात यह है कि जब विवाहिता को मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, तो वहां के चिकित्सकों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया। अब सबसे बड़ा और संवेदनशील सवाल यह उठ रहा है कि क्या महिला की मौत अस्पताल परिसर में ही हो चुकी थी और प्रबंधन ने अपनी गर्दन बचाने तथा कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए एक सोची-समझी साजिश के तहत उसे ‘रेफर’ करने का नाटक रचा था?

आयुष्मान कार्ड के उपयोग से इनकार और सौदेबाजी का पेच
इस पूरी घटना के बाद से अस्पताल प्रबंधन और शोकसंतप्त परिजनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेजी से जारी है। परिजनों ने सीधा आरोप लगाया है कि जब उन्होंने अस्पताल में आयुष्मान कार्ड के माध्यम से इलाज करने की बात कही, तो अस्पताल ने इसे स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। वहीं, जब मामला तूल पकड़ने लगा और प्रशासन की सख्ती की सुगबुगाहट हुई, तो अस्पताल के डॉक्टर अब यह दावा कर रहे हैं कि परिजनों ने स्वयं स्वेच्छा से नगद भुगतान करने की लिखित सहमति दी थी। यह पहलू जांच का सबसे अहम और बड़ा विषय है। आखिर कोई भी मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार, जब सरकार द्वारा मुफ्त इलाज की योजनाएं संचालित की जा रही हैं, अपनी जेब से पैसे क्यों खर्च करना चाहेगा? क्या परिजनों पर मानसिक दबाव बनाकर या उन्हें गुमराह करके यह जबरन सहमति लिखवाई गई थी?

गंभीर लक्षणों की अनदेखी और चिकित्सा रिकॉर्ड से छेड़छाड़ या लापरवाही
लापरवाही की इंतहा तब पार हो गई जब इलाज के दौरान मरीज ने डॉक्टर को खून की उल्टी होने की गंभीर शिकायत की। इतने खतरनाक और गंभीर लक्षण सामने आने के बावजूद क्या अस्पताल ने एंडोस्कोपी जैसी बुनियादी और जरूरी जांच करवाने की जहमत उठाई? इसके अलावा, जब मरीज के शरीर पर अचानक लाल गोल धब्बे उभरने लगे, तो उसे अस्पताल की एम्बुलेंस से एक त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास दिखाया गया। परंतु सबसे बड़ा आश्चर्य और लापरवाही का सुबूत यह है कि परिजनों को अस्पताल की ओर से जो मेडिकल फाइल सौंपी गई है, उसमें उस त्वचा रोग विशेषज्ञ की रिपोर्ट ही पूरी तरह गायब है। वहीं, ईसीजी रिपोर्ट को पूरी तरह सामान्य बताकर स्थिति को हल्के में लिया गया। डॉक्टर का अब इस पर रटा-रटाया और गैर-जिम्मेदाराना जवाब सामने आ रहा है कि मरीज की हालत बिगड़ने पर उसे बेहतर इलाज के लिए रायपुर या मेडिकल कॉलेज ले जाने की सलाह दी गई थी।
न्याय की गुहार और उच्च स्तरीय जांच की मांग
एक पल में हमेशा के लिए बिछड़ जीवनसंगिनी और बिखर चुके परिवार ने अब शासन-प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से न्याय की गुहार लगाई है। पारख नर्सिंग होम की संपूर्ण भूमिका, इलाज से जुड़ी मेडिकल फाइल, गायब जांच रिपोर्ट, आयुष्मान कार्ड से इनकार करने के कारणों और संदिग्ध रेफरल दस्तावेजों की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होना बेहद आवश्यक हो गया है। जनता और परिजनों की मांग है कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले का तुरंत संज्ञान ले और एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन करे, जिससे यह दूध का दूध और पानी का पानी हो सके कि बैसाखीन की मौत की असल वजह क्या थी। दोषियों पर ऐसी कड़ी और नज़ीर पेश करने वाली कार्रवाई होनी चाहिए, जिससे भविष्य में कोई अन्य निजी अस्पताल मरीजों की जान और पैसों के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न जुटा सके।




