हाई कोर्ट का ‘हंटर’, कलेक्टर जशपुर को अल्टीमेटम: 33 साल पुराने पुलिसिया कत्लकांड में 45 दिनों के भीतर दें मुआवजा!…

बिलासपुर/जशपुर: “अगर मारना है तो मुझे मारो!”— ये शब्द 1992 में एक आदिवासी युवा नेता रामनाथ नागवंशी के आखिरी शब्द थे, जिसके जवाब में पुलिस की गोली उनके सीने के पार हो गई थी। आज 33 साल बाद, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने उस दबे हुए इंसाफ की आग को फिर से सुलगा दिया है। कोर्ट ने शासन को कड़ी फटकार लगाते हुए आदेश दिया है कि पीड़ित परिवार को 45 दिनों के भीतर मुआवजा दिया जाए।
वारदात: जब रक्षक ही बन गए भक्षक : साल 1992, थाना कासाबेल। पुलिस ने 20-25 आदिवासियों को नक्सली बताकर उठाया और थाने में अमानवीय ‘थर्ड डिग्री’ दी। जुल्म की इंतहा तब हुई जब परिजनों ने अपने अपनों को छुड़ाने की गुहार लगाई। पुलिस ने संवेदनहीनता दिखाते हुए महिलाओं तक को नहीं बख्शा। इसी बीच, अपने माता-पिता को बचाने सामने आए रामनाथ को तत्कालीन थाना प्रभारी एच.आर. अहिरवार ने सरेआम सीने में गोली मार दी।
अंतिम संस्कार का हक भी छीना: रूह कंपा देने वाली क्रूरता – पुलिस की बर्बरता यहीं नहीं रुकी। साक्ष्य मिटाने के लिए:
- मृतक रामनाथ (जो ईसाई धर्म से थे) के शव को परिजनों को नहीं सौंपा गया।
- परंपरा के विरुद्ध जाकर शव को जला दिया गया, ताकि गोली के निशान और सबूत खाक हो जाएं।
- परिजनों को उनके धार्मिक रीति-रिवाजों से अंतिम विदाई तक नहीं देने दी गई।
न्याय की कछुआ चाल और ‘सिस्टम’ से जंग – मृतक के भाई रीमनाथ सूर्यवंशी ने हार नहीं मानी। 1992 से शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी:
- सेशन कोर्ट (1997) : लंबी सुनवाई के बाद थाना प्रभारी को धारा 304 के तहत 5 वर्ष की सजा हुई।
- मानवाधिकार उल्लंघन : सजा तो हुई, लेकिन पीड़ित परिवार तीन दशकों तक दाने-दाने को मोहताज रहा। न आर्थिक मदद मिली, न ही सम्मान।
- हाई कोर्ट का हस्तक्षेप : मानवाधिकार कार्यकर्ता और अधिवक्ता सी.एस. चौहान के माध्यम से जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तब जाकर शासन की नींद टूटी।
हाई कोर्ट का ‘हंटर ‘: 45 दिन का अल्टीमेटम : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले को मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन माना है। कोर्ट ने कलेक्टर जशपुर को स्पष्ट निर्देश दिया है कि :
”33 वर्षों का मानसिक और आर्थिक संताप झेल रहे परिवार को अगले 45 दिनों के भीतर क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।”
देर है, पर अंधेर नहीं : यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है जो वर्दी की आड़ में कानून को अपनी जागीर समझते हैं। डेंगूरजोर का यह मामला आज के दौर में भी प्रासंगिक है, जो याद दिलाता है कि सत्ता और बंदूक के दम पर सच को दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता।




