विशेष रिपोर्ट : 8 साल, 2 करोड़ का बजट और बीच नदी खड़ा ‘सिस्टम का कंकाल’…

- सक्ती जिले में विकास के दावों की खुली पोल: 40 हजार आबादी 7 किमी अतिरिक्त सफर करने को मजबूर…
सक्ती/जांजगीर। छत्तीसगढ़ में सुशासन और ‘कनेक्टिविटी’ के बड़े-बड़े दावों के बीच सक्ती जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो लोक निर्माण विभाग (सेतु संभाग) की कार्यशैली पर करारा तमाचा है। सोन नदी पर बन रहा लालमाटी-भनेतरा पुल पिछले 8 वर्षों से एक ‘कंकाल’ की तरह खड़ा है। करीब 2.10 करोड़ की लागत वाले इस प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार की बू आ रही है या प्रशासनिक अदूरदर्शिता की, यह जांच का विषय है, लेकिन इसका खामियाजा इलाके के 20 गांवों की 40 हजार जनता भुगत रही है।
उम्मीदों का पुल या भ्रष्टाचार का ढांचा? – साल 2015-16 में जब इस पुल की मंजूरी मिली, तो ग्रामीणों ने खुशियां मनाई थीं। उन्हें लगा था कि अब नदी पार करने का जोखिम और लंबी दूरी का चक्कर खत्म होगा। नटराज इंफ्रा बिल्डकॉन नामक कंपनी को ठेका मिला। शुरुआती दौर में काम चला, खंभे (स्पान) खड़े हुए, लेकिन जैसे ही बजट और डिजाइन का पेंच फंसा, ठेकेदार ने काम बीच में ही छोड़ दिया।
आज स्थिति यह है कि 5 स्लैब में से केवल 2 स्लैब ही डाले जा सके हैं। शेष 3 स्लैब के इंतजार में यह पुल पिछले कई सालों से अधूरा पड़ा है। खुले में छोड़े गए सरियों पर जंग लग चुका है, जो भविष्य में पुल की मजबूती पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
‘डिजाइन’ के नाम पर जनता से धोखा! – विभाग का तर्क है कि ‘फाउंडेशन डिजाइन’ में बदलाव के कारण लागत बढ़ गई। सवाल यह उठता है कि क्या प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले कोई सर्वे नहीं किया गया था?
- ठेकेदार का दावा : “हमने तय बजट का काम पूरा कर दिया।”
- विभाग का तर्क : “फंड की कमी है, नया टेंडर होगा।”
- जनता का दर्द : “हमें राजनीति और तकनीकी बारीकियों से मतलब नहीं, हमें रास्ता चाहिए।”
7 किमी का ‘अतिरिक्त’ दंश और सिसकती स्वास्थ्य सेवाएं – पुल न होने के कारण ग्रामीणों को रोजाना 7 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर तय करना पड़ता है। यह केवल दूरी नहीं, बल्कि समय और पैसे की बर्बादी है।
- स्कूली बच्चे: बरसात के दिनों में जब नदी उफान पर होती है, तो बच्चों की पढ़ाई ठप हो जाती है।
- इमरजेंसी : किसी को दिल का दौरा पड़े या प्रसव पीड़ा हो, तो 7 किमी का यह अतिरिक्त चक्कर जानलेवा साबित हो सकता है।
- आर्थिक नुकसान : किसानों को अपनी उपज मंडी तक ले जाने के लिए दोगुना किराया चुकाना पड़ रहा है।
प्रोजेक्ट प्रोफाइल : सफेद हाथी की पूरी कहानी –

बिलासपुर-जांजगीर का मुख्य मार्ग, फिर भी अनदेखी क्यों? – यह पुल केवल दो गांवों को नहीं जोड़ता, बल्कि हसौद, चंद्रपुर, शिवरीनारायण और जांजगीर-बिलासपुर तक पहुंचने का सबसे छोटा और सुगम मार्ग है। इसके बन जाने से क्षेत्र की आर्थिक स्थिति बदल सकती थी। व्यावसायिक गाड़ियों का आवागमन बढ़ता और रोजगार के अवसर पैदा होते, लेकिन विभाग की फाइलों में यह प्रोजेक्ट धूल फांक रहा है।
जिम्मेदार का ‘रटा-रटाया’ जवाब :
“अभी स्लैब डालने का काम बाकी है। हम पूरे काम का दोबारा मूल्यांकन कर रहे हैं। बचे हुए काम के लिए फंड की मांग की जाएगी और टेंडर प्रक्रिया के बाद काम शुरू होगा।”
एनआर भगत, एसडीओ, सेतु विभाग जांजगीर-चांपा
तीखा सवाल : क्या विभाग को 8 साल लग गए सिर्फ ‘मूल्यांकन’ करने में? क्या जनता के टैक्स का पैसा इसी तरह जंग खाने के लिए छोड़ा गया है? अगर लागत बढ़ी थी, तो समय रहते संशोधित बजट क्यों नहीं पास कराया गया?
सक्ती का यह अधूरा पुल शासन-प्रशासन की नाकामी का जीता-जागता स्मारक है। अगर जल्द ही इस पर काम शुरू नहीं हुआ, तो आगामी चुनावों में ग्रामीण ‘वोट की चोट’ से जवाब देने की तैयारी कर रहे हैं।




