रायगढ़ : 10 साल से ‘लापता’ नहर परियोजना के लिए फिर ज़मीन पर ‘नज़र’, ग्रामीणों ने खोला मोर्चा…

रायगढ़। विकास की सुस्त चाल और सरकारी सिस्टम की बेरुखी के बीच टिनमिनी के किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। रायगढ़ जिले की छिछोर-उमरिया टेल माइनर नहर निर्माण परियोजना एक बार फिर विवादों के घेरे में है। 10 साल पहले ली गई ज़मीन पर आज तक काम की एक ईंट नहीं रखी गई, लेकिन प्रशासन अब नई ज़मीनों को अधिग्रहित करने के लिए नोटिस बाँट रहा है।
ग्रामीणों ने दो टूक कह दिया है – “जब तक न्यायसंगत मुआवजा नहीं, तब तक कब्जा नहीं!”
क्या है पूरा विवाद? –
- दशक भर का इंतज़ार : करीब 10 साल पहले इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण शुरू हुआ था। कई किसान आज भी मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
- कागजों पर नहर, ज़मीन पर सन्नाटा : ग्रामीणों का आरोप है कि पुरानी अधिग्रहित भूमि पर आज तक कोई काम शुरू नहीं हुआ, फिर नई ज़मीन हड़पने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
- धारा 21 का ‘डंडा’ : अनुविभागीय अधिकारी (SDM) और भू-अर्जन अधिकारी ने भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 की धारा 21 के तहत नोटिस जारी किया है।
प्रशासन की ‘डेडलाइन’ और ग्रामीणों का आक्रोश : प्रशासन ने टिनमिनी के किसानों को 2 फरवरी तक का समय दिया है कि वे न्यायालय में उपस्थित होकर अपना दावा (वृक्ष, बोर, संपत्ति आदि) पेश करें। नोटिस में साफ चेतावनी दी गई है कि यदि तय समय पर कोई नहीं पहुँचा, तो इसे उनकी सहमति मान ली जाएगी।
“प्रशासन का यह रवैया तानाशाही जैसा है। हमें न तो मुआवजे की स्पष्ट जानकारी दी गई है और न ही पुनर्वास की नीति बताई गई है। पुरानी ज़मीन पर काम हुआ नहीं और अब नई ज़मीन छीनी जा रही है।” > — अमन गुप्ता, ग्रामीण
अपर कलेक्टर के पास पहुँची शिकायत : सोमवार को बड़ी संख्या में किसान एसडीएम कार्यालय पहुँचे थे, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में ग्रामीणों ने अपर कलेक्टर से मुलाकात की। किसानों ने मांग रखी है कि:
- पुराने अधिग्रहित क्षेत्रों में पहले नहर का निर्माण कार्य शुरू हो।
- जिन किसानों का सालों से मुआवजा अटका है, उनका भुगतान तुरंत किया जाए।
- नई भूमि के लिए बाज़ार दर पर न्यायसंगत मुआवजा और पुनर्वास योजना सार्वजनिक की जाए।
बड़ा सवाल : विकास या केवल कागजी खानापूर्ति? – 10 साल का समय किसी भी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए काफी होता है, लेकिन छिछोर-उमरिया परियोजना सरकारी फाइलों में ही दफन रही। अब जब फिर से अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज हुई है, तो ग्रामीणों का असंतोष एक बड़े आंदोलन की आहट दे रहा है।
क्या प्रशासन किसानों की जायज मांगों को सुनेगा या एक बार फिर विकास के नाम पर किसानों की आजीविका पर ‘बुलडोजर’ चलेगा?




