रामानुजगंज में ‘अफसरशाही’ बेलगाम : अपर कलेक्टर के आदेश को रद्दी की टोकरी में डाल RI ने किया ‘खेल’!…

• न्याय व्यवस्था को ठेंगा : स्टे ऑर्डर के बावजूद विवादित जमीन का ऑनलाइन नामांतरण, 5 में से 3 हिस्सेदार गायब, प्रशासन मौन…
बलरामपुर। क्या रामानुजगंज में कनिष्ठ अधिकारी (RI) अब अपर कलेक्टर (Upper Collector) से भी ऊपर हो गए हैं? क्या प्रशासन में पद और आदेश की गरिमा खत्म हो चुकी है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि यहाँ राजस्व विभाग में “अंधेर नगरी, चौपट राजा” वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। एक पीड़ित पक्षकार हाथ में अपर कलेक्टर का ‘स्टे ऑर्डर’ लेकर घूमता रहा, लेकिन राजस्व निरीक्षक (RI) ने कथित तौर पर कानून की धज्जियां उड़ाते हुए विवादित जमीन का ऑनलाइन नामांतरण कर दिया।

मामला क्या है? – रामानुजगंज निवासी नवीन कुमार तिवारी (आत्मज स्व. भरत प्रसाद तिवारी) एक पारिवारिक जमीनी विवाद और वसीयत के मामले में न्याय की गुहार लगा रहे थे। जब निचले स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने न्यायालय अपर कलेक्टर, रामानुजगंज का दरवाजा खटखटाया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर कलेक्टर ने 13 अक्टूबर 2025 को धारा 52 के तहत स्पष्ट स्थगन आदेश (Stay Order) जारी किया। आदेश में साफ लिखा था कि आगामी आदेश तक नजूल अधिकारी द्वारा पारित आदेश (दिनांक 11.09.2025) के क्रियान्वयन पर रोक लगाई जाती है।
स्टे ऑर्डर का खुला मखौल : नवीन तिवारी का आरोप है कि उन्होंने अपर कलेक्टर के इस आदेश की प्रति स्वयं राजस्व निरीक्षक (RI) और तहसीलदार कार्यालय में जमा कराई थी। RI ने उन्हें आश्वासन भी दिया कि “मैं देख लूंगा।” लेकिन पर्दे के पीछे कहानी कुछ और ही रची गई।
नवीन तिवारी ने कैमरे पर आरोप लगाते हुए कहा :
“मैंने RI साहब को बताया था कि इसमें स्टे है, उन्होंने कहा कि देख लेंगे। लेकिन उन्होंने स्टे ऑर्डर की धज्जियां उड़ाते हुए, बिना हमें सूचना दिए, बिना हमारा पक्ष सुने, एकतरफा ऑनलाइन नामांतरण कर दिया। इस मामले में 5 पार्टी (हि हिस्सेदार) थे, लेकिन गुपचुप तरीके से काम निपटा दिया गया।”
गंभीर सवाल जो प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं :
- पदानुक्रम (Hierarchy) का अपमान क्यों? जब जिले के अपर कलेक्टर ने किसी प्रक्रिया पर रोक (Stay) लगा दी है, तो एक राजस्व निरीक्षक (RI) में इतनी हिम्मत कहां से आई कि वह उस आदेश को दरकिनार (Overrule) कर सके?
- किसका दबाव या किसका ‘हित’? स्टे ऑर्डर के बावजूद इतनी हड़बड़ी में नामांतरण क्यों किया गया? क्या इसके पीछे कोई बड़ा लेन-देन या रसूखदार का दबाव काम कर रहा है?
- गायब हुए हिस्सेदार: 5 हिस्सेदारों वाली जमीन के मामले में बाकी पक्षों को ‘नोटिस’ तक क्यों नहीं दिया गया? प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत का गला क्यों घोंटा गया?
कानूनी पेंच : फंस सकते हैं जिम्मेदार अधिकारी – कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह मामला सिर्फ विभागीय लापरवाही का नहीं, बल्कि न्यायिक अवमानना (Contempt of Court) और IPC की धारा 166 (A) (लोक सेवक द्वारा कानून की अवज्ञा) का बनता है। यदि जानबूझकर कोर्ट के स्टे के बावजूद जमीन का हेर-फेर किया गया है, तो संबंधित अधिकारी पर आपराधिक मामला भी दर्ज हो सकता है।
पीड़ित की अंतिम चेतावनी : नवीन तिवारी ने साफ कर दिया है कि वे इस अन्याय के खिलाफ झुकेंगे नहीं। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि:
- अवैध रूप से किए गए ऑनलाइन नामांतरण को तत्काल प्रभाव से शून्य (Null & Void) घोषित किया जाए।
- न्यायिक आदेश की अवहेलना करने वाले राजस्व निरीक्षक के खिलाफ कठोर दंडात्मक और विभागीय कार्रवाई हो।
अब देखना यह है कि कलेक्टर बलरामपुर इस मामले में अपनी कलम की ताकत दिखाते हैं या फिर एक उच्च अधिकारी के आदेश की तौहीन करने वाली यह फाइल भी सरकारी दफ्तरों में धूल फांकती रह जाएगी?




