रायगढ़ : कोल ट्रांसपोर्ट की आड़ में पनपता ‘गैंग कल्चर’, यूनियन गतिविधियों पर खूनी हमला और मिर्ची स्प्रे से शुरू हुई ‘गैंगवार’…

रायगढ़। विशेष संवाददाता। औद्योगिक जिला रायगढ़, जो कभी अपनी चिमनियों से निकलते धुएं के लिए जाना जाता था, अब बारूद की गंध और ‘गैंगवार’ के प्रदूषण से घुटने लगा है। हालिया घटनाक्रम ने न केवल खाकी वर्दी की इकबालिया साख पर सवालिया निशान लगा दिया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि यहाँ कानून का नहीं, बल्कि ‘माफिया राज’ का सिक्का चल रहा है।

निजी विवाद नहीं, संवैधानिक हक़ पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ – सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रशासन इसे महज एक आपसी रंजिश मानकर पल्ला झाड़ने की कोशिश में है, जबकि हकीकत बेहद खौफनाक है। यह हमला किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का नतीजा नहीं, बल्कि वैधानिक यूनियन गतिविधियों पर सीधा प्रहार है।
श्रमिक संगठनों और व्यापारिक संस्थाओं को निशाना बनाकर जिस तरह सरेआम गुंडागर्दी का नाच किया गया, उसने औद्योगिक शांति की धज्जियां उड़ा दी हैं। जब अपराधी कानून प्रवर्तन एजेंसियों (पुलिस) के सामने खड़े होकर दुस्साहस का परिचय दे रहे हों, तो यह समझ लेना चाहिए कि सिस्टम ‘वेंटिलेटर’ पर है।
‘मिर्ची स्प्रे’ बना ट्रिगर : बंटी डालमिया और विवाद की चिंगारी – इस खूनी संघर्ष की पटकथा में एक नया और घातक हथियार सामने आया है – मिर्ची स्प्रे (Chili Spray)।
सूत्रों के मुताबिक, विवाद की शुरुआत बंटी डालमिया द्वारा कथित तौर पर मिर्ची स्प्रे के इस्तेमाल से हुई। बताया जा रहा है कि बंटी डालमिया पूरी तैयारी के साथ मौके पर पहुंचा था। जैसे ही बहस शुरू हुई, स्प्रे का इस्तेमाल किया गया, जिसने आग में घी का काम किया। देखते ही देखते विवाद ने हिंसक रूप ले लिया, हथियार लहराए जाने लगे और नौबत गोलीबारी तक आ पहुंची।
अंदर की बात : यह वही मॉडस ऑपरेंडी है जो बड़े शहरों के संगठित अपराध में देखी जाती है। पहले आँखों में धूल (या मिर्ची) झोंको, और फिर हथियारों के दम पर दहशत फैलाओ।
आशीष यादव और ‘वसूली सिंडिकेट’ का काला सच – इस पूरे प्रकरण की जड़ें आशीष यादव के नाम से जुड़ी अवैध वसूली के सिंडिकेट तक जा रही हैं। अवैध वसूली का मुद्दा अब नासूर बन चुका है। यह लड़ाई सिर्फ़ मारपीट की नहीं, बल्कि कोल ट्रांसपोर्ट (Coal Transport) के काले कारोबार पर एकछत्र राज करने की है।
- रायगढ़ बनाम ओडिशा : यह लड़ाई अब दो गुटों के बीच वर्चस्व (Dominance) का खूनी खेल बन चुकी है। एक पक्ष रायगढ़ में अपना दबदबा कायम करना चाहता है, तो दूसरा ओडिशा बॉर्डर से अपनी सल्तनत चलाना चाहता है।
- पूर्व में हुई ताबड़तोड़ फायरिंग की घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि यह गैंगवार अब रुकने वाली नहीं है।
औद्योगिक प्रदूषण के साथ अब ‘क्राइम का प्रदूषण’ : रायगढ़ की जनता पहले ही उद्योगों के प्रदूषण से त्रस्त थी, अब उसे ‘गैंगवार के प्रदूषण’ का भी सामना करना पड़ रहा है। औद्योगिक गतिविधियों, ठेकेदारी प्रथा और श्रमिक संगठनों के बीच में जिस तरह से अपराधी तत्व घुसपैठ कर चुके हैं, वह अलार्मिंग है।
प्रशासन को सीधी चेतावनी : बंटी डालमिया और आशीष यादव जैसे नामों का केंद्र में आना और खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन यह बताता है कि स्थानीय गुंडे अब ‘ऑर्गनाइज्ड क्राइम सिंडिकेट’ में तब्दील हो चुके हैं। यदि पुलिस प्रशासन ने अपनी ‘नींद’ नहीं तोड़ी और इस गैंग कल्चर को जड़ से नहीं उखाड़ा, तो रायगढ़ का हश्र भी ‘वासेपुर’ जैसा होने में देर नहीं लगेगी।
सवाल वही है : क्या पुलिस सिर्फ़ लकीर पीटेगी, या इन सफ़ेदपोश गुंडों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी?




