बिलासपुर में जनशक्ति के आगे झुका तंत्र अमाली में ‘कोयला’ के खिलाफ ‘इंसान’ की जीत, कोल वाशरी की जनसुनवाई रद्द?…

बिलासपुर (कोटा) : लोकतंत्र की असली ताकत क्या होती है, इसका जीवंत उदाहरण आज कोटा क्षेत्र के अमाली गांव में देखने को मिला। भारी सुरक्षा घेरे और प्रशासनिक तामझाम के बीच जब सैकड़ों ग्रामीणों ने एक सुर में “जमीन देंगे न जान देंगे, कोल वाशरी नहीं बनने देंगे” का नारा बुलंद किया, तो जिला प्रशासन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। भारी जनविरोध और तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए अधिकारियों ने प्रस्तावित कोल वाशरी की लोक सुनवाई को एक माह के लिए स्थगित करने का आदेश जारी कर दिया है।
छावनी बना अमाली, फिर भी नहीं डरे ग्रामीण : प्रशासन ने लोक सुनवाई को सफल बनाने के लिए अमाली को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया था। भारी संख्या में पुलिस बल और अधिकारियों की मौजूदगी यह संकेत दे रही थी कि सुनवाई किसी भी हाल में पूरी कराई जाएगी। लेकिन, जैसे ही सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई, अमाली, पथर्रा, खरगहनी और आसपास के गांवों के हजारों ग्रामीण—पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग—काले झंडे और बैनर लेकर आयोजन स्थल पर डट गए।
क्यों भड़का है आक्रोश? (विरोध की बड़ी वजहें) – ग्रामीणों का विरोध केवल कागजी नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की लड़ाई है:
- अस्तित्व का संकट : ग्रामीणों का कहना है कि यह क्षेत्र कृषि प्रधान है। कोल वाशरी से निकलने वाली कालिख उनकी लहलहाती फसलों को बर्बाद कर देगी।
- जल प्रदूषण का डर : कोल वाशरी में भारी मात्रा में पानी की खपत होती है। ग्रामीणों को डर है कि भू-जल स्तर गिरने के साथ-साथ अरपा नदी का पानी भी प्रदूषित हो जाएगा।
- स्वास्थ्य पर हमला : कोयले की धूल से सांस और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
प्रशासनिक विफलता और फैसला : जैसे ही अधिकारियों ने प्रोजेक्ट के फायदे गिनाने शुरू किए, ग्रामीणों ने नारेबाजी तेज कर दी। माहौल इतना गर्मा गया कि अधिकारियों को मंच छोड़ना पड़ा। भीड़ का आक्रोश देख अपर कलेक्टर (ADM) और पर्यावरण विभाग के अधिकारियों ने आपस में चर्चा की। अंततः, माइक से घोषणा की गई कि:
”जनता की भावनाओं और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, आज की लोक सुनवाई को आगामी एक माह के लिए टाला जाता है।”
इसे ‘स्थगन’ कहें या ‘जीत’? – प्रशासन भले ही इसे एक महीने का ‘विराम’ कह रहा हो, लेकिन ग्रामीण इसे अपनी बड़ी जीत मान रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे स्थानीय नेताओं का कहना है कि यह लड़ाई केवल एक महीने के लिए नहीं रुकी है; जब तक प्रोजेक्ट पूरी तरह रद्द नहीं हो जाता, तब तक विरोध की यह आग ठंडी नहीं होगी।
ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष : अमाली की यह घटना यह बताती है कि जब पर्यावरण और आजीविका पर संकट आता है, तो ग्रामीण किसी भी ताकत से टकराने को तैयार रहते हैं। प्रशासन के पास अब 30 दिन का समय है, लेकिन ग्रामीणों के तेवर साफ हैं – उन्हें विकास चाहिए, विनाश नहीं।




