सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : “सिर्फ कागजों पर जिंदा शादी को ढोना क्रूरता है,” 24 साल की ‘कैद’ से पति-पत्नी को मिली आजादी…

नई दिल्ली | क्या उस रिश्ते को शादी कहा जा सकता है जो पिछले 24 सालों से केवल अदालती फाइलों और कागजों में सांस ले रहा हो? सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद सख्त और महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया कि “मृत प्राय विवाह” (Dead Marriage) को जबरन बनाए रखना न केवल कानूनन बेमानी है, बल्कि यह पति-पत्नी दोनों के लिए ‘क्रूरता’ के समान है।
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस जॉयमलया बागची की पीठ ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए 24 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपती के तलाक को मंजूरी दे दी। कोर्ट ने साफ कहा कि जब सुलह की हर गुंजाइश खत्म हो चुकी हो, तो यह मायने नहीं रखता कि गलती किसकी थी।
फैसले की 5 बड़ी और धारदार बातें :
- कागजी रिश्ता यानी क्रूरता : कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी शादी को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं, जो वास्तविक रूप से वर्षों पहले दम तोड़ चुकी हो। अलग रहने की जिद और लंबी मुकदमेबाजी दोनों पक्षों को मानसिक पीड़ा देती है, जो कानून की नजर में ‘क्रूरता’ है।
- दोष किसका? अब यह सवाल बेमानी : सुप्रीम कोर्ट ने ‘फॉल्ट थ्योरी’ (दोष सिद्धांत) को किनारे करते हुए कहा कि जब 24 साल से पति-पत्नी अलग हों, तो यह तय करना अप्रासंगिक है कि घर छोड़ने का दोषी कौन था। महत्वपूर्ण यह है कि रिश्ता अब जुड़ नहीं सकता।
- अनुच्छेद 142 का ‘ब्रह्मास्त्र’ : अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए कहा कि पूर्ण न्याय करने के लिए वह वैधानिक अड़चनों से परे जाकर विवाह विच्छेद कर सकता है।
- समाज को दखल का हक नहीं : जस्टिस मनमोहन ने फैसले में लिखा कि वैवाहिक जीवन को लेकर पति-पत्नी का दृष्टिकोण अलग हो सकता है। इसमें न तो समाज और न ही अदालत यह तय कर सकती है कि किसका नजरिया सही है।
- 1 साल साथ, 24 साल विवाद : इस केस की विडंबना देखिए – शादी साल 2000 में हुई, नवंबर 2001 में दोनों अलग हो गए। यानी साथ रहे महज 1 साल, लेकिन अदालतों में लड़े 24 साल। इस शादी से कोई संतान भी नहीं थी।
हाईकोर्ट को फटकार, ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल : गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 2011 में तलाक की अर्जी यह कहकर खारिज कर दी थी कि पत्नी के पास घर छोड़ने का उचित कारण था और पति अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने शिल्पा सैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023) और कुमारी रेखा बनाम शंभू सरन पासवान (2025) जैसे नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि “विवाह का अपूरणीय विघटन” (Irretrievable Breakdown of Marriage) अपने आप में तलाक का एक ठोस आधार है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन हजारों मुकदमों के लिए नजीर बनेगा जहां शादियां भावनात्मक रूप से मर चुकी हैं, लेकिन कानूनी पेचीदगियों के चलते लोग ‘लाश’ बन चुके रिश्तों को ढोने के लिए मजबूर हैं।




