छत्तीसगढ़ आरक्षक भर्ती : ‘खाकी’ की साख पर फिर सवाल; मेधावी सड़क पर और ‘जुगाड़’ वाले चयनित? मामला पहुँचा हाईकोर्ट…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती विवाद की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अब आरक्षक भर्ती परीक्षा (Constable Recruitment) बना बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों से घिर गई है। प्रदेश के 33 जिलों में 5,967 पदों के लिए 9 दिसंबर को जारी चयन सूची ने हजारों युवाओं के सपनों पर पानी फेर दिया है। असंतोष की यह आग अब सड़कों से होते हुए न्याय की दहलीज (हाईकोर्ट) तक पहुँच चुकी है।
गुरुवार को प्रदेश भर के नाराज अभ्यर्थी बिलासपुर हाईकोर्ट के सामने एकत्रित हुए। पुलिस द्वारा खदेड़े जाने के बाद देर शाम पुलिस ग्राउंड में रणनीति बनी और अब शुक्रवार को उच्च न्यायालय में सामूहिक याचिका दायर करने की तैयारी है।
चयन प्रक्रिया में “खेल” : प्रमुख आरोप और विसंगतियां – अभ्यर्थियों ने दस्तावेजों और प्रमाणों के साथ भर्ती प्रक्रिया में गंभीर खामियों को उजागर किया है, जो पूरी व्यवस्था को संदेह के घेरे में खड़ा करती है :
- मेरिट की हत्या : कम अंक वाले चयनित, मेधावी बाहर – सबसे गंभीर आरोप मेरिट के उल्लंघन का है। मुंगेली जिले का उदाहरण देते हुए अभ्यर्थियों ने बताया कि ओबीसी वर्ग के एक उम्मीदवार को शारीरिक (76) और लिखित (60) मिलाकर कुल 136 अंक मिले, फिर भी वह चयन से वंचित है। वहीं, आरोप है कि उससे कम अंक पाने वाले कई उम्मीदवारों का चयन सामान्य वर्ग (General Category) से कर लिया गया है। यह पारदर्शिता के अभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
- एक उम्मीदवार, कई जिले : हजारों पद रह जाएंगे खाली – भर्ती 2007 के पुराने राजपत्र (Gazette) के आधार पर हुई है, जिससे एक उम्मीदवार ने कई जिलों से फॉर्म भरा। नतीजा यह हुआ कि एक ही उम्मीदवार का नाम 5-6 जिलों की चयन सूची में है।
- ‘रोल नंबर’ का रहस्य : पहचान छिपाने की कोशिश? – पारदर्शिता के नियमों को ताक पर रखते हुए अलग-अलग जिलों में रिजल्ट का फॉर्मेट अलग-अलग रखा गया है : कुछ जिलों में नाम और पिता का नाम गायब है, सिर्फ रोल नंबर है। कोंडागांव और नारायणपुर में एक ही एप्लीकेशन नंबर पर अलग-अलग नाम दर्ज होने के प्रमाण मिले हैं। वहीं बिलासपुर में अधूरी जानकारी के साथ सूची जारी की गई है। अभ्यर्थियों का सवाल है कि आखिर चयनितों की पहचान छिपाने की मजबूरी क्यों है?
- वेटिंग लिस्ट में भी गड़बड़ी : अनारक्षित (Unreserved) वर्ग की वेटिंग लिस्ट में जिन अभ्यर्थियों के नाम हैं, उन्हीं के नाम आरक्षित (Reserved) वर्ग की सूची में भी डाल दिए गए हैं। नियमों के मुताबिक, एक सूची में एक अभ्यर्थी का नाम दो जगहों पर नहीं हो सकता। यह विसंगति योग्य उम्मीदवारों के अधिकार को छीन रही है।
सड़क से प्रशासन तक संघर्ष : गुरुवार को जब अभ्यर्थी हाईकोर्ट के गेट पर शांतिपूर्ण चर्चा कर रहे थे, तो पुलिस बल ने उन्हें वहां से हटा दिया। इसके बाद वे पुलिस ग्राउंड पहुंचे, जहाँ आरआई (RI) और जवानों ने उन्हें फिर हटाने की चेतावनी दी।
अंततः हताश अभ्यर्थी एसएसपी (SSP) रजनेश सिंह के कार्यालय पहुंचे। एसएसपी ने छात्रों की बात धैर्यपूर्वक सुनी और आरोपों के प्रमाण मांगे। जब छात्रों ने बताया कि वे डाटा कलेक्ट कर रहे हैं, तो एसएसपी ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आरआई को निर्देशित किया कि युवाओं को पुलिस ग्राउंड से न हटाया जाए और उन्हें चर्चा करने के लिए स्थान दिया जाए।
न्याय की आस : शुक्रवार का दिन इन 5,967 पदों और हजारों युवाओं के भविष्य के लिए निर्णायक होगा। अभ्यर्थी अब जिलेवार गड़बड़ियों का ‘डेटा बैंक’ तैयार कर हाईकोर्ट में न्याय की गुहार लगाएंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन तकनीकी और नैतिक खामियों को स्वीकार कर सुधार करेगा, या फिर यह भर्ती भी लंबी कानूनी लड़ाई में उलझकर रह जाएगी?




