तमनार में आर-पार की जंग : ‘जान देंगे पर जमीन नहीं’ – महिलाओं के ‘मानव-चक्रव्यूह’ से घिरी जनसुनवाई, 14 गांवों की हुंकार से कांपा प्रशासन…

रायगढ़। जिले का कोयलांचल एक बार फिर सुलग उठा है। तमनार के धौराभांठा में गारे-पेलमा कोल ब्लॉक सेक्टर–1 की जनसुनवाई महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व बचाने के धर्मयुद्ध’ में बदल गई है। कड़ाके की ठंड और प्रशासन की सख्ती के बीच 14 गांवों के ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है- “हमारी लाशों से गुजरकर ही कोई हमारी जमीन ले पाएगा।”

मातृशक्ति का ‘अभेद्य किला’ : पुलिस बेबस – आज सुबह का मंजर प्रशासन के रोंगटे खड़े करने वाला था। जनसुनवाई स्थल पर किसी टेंट या कुर्सी की जगह, चारों तरफ हजारों महिलाओं की मानव-शृंखला नजर आई। यह केवल भीड़ नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘मानव-चक्रव्यूह’ था, जिसने कसम खा रखी थी कि प्रशासन का कोई भी नुमाइंदा या बाहरी दलाल ग्राउंड के भीतर पैर नहीं रख सकता। हाथों में तख्तियां और जुबां पर “जनसुनवाई रद्द करो” के नारे लिए, इन महिलाओं की एकजुटता के आगे भारी पुलिस बल भी बौना नजर आया।
800 पुलिसकर्मियों से छावनी बना गांव : सूत्रों के मुताबिक, प्रशासन ने इस विरोध को कुचलने और जनसुनवाई कराने के लिए प्रदेश के अलग-अलग जिलों से 800 से 1000 पुलिसकर्मियों की फौज उतार दी है। पूरा धौराभांठा पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका है। लेकिन संगीनों के साये और खाकी वर्दी का रौब भी ग्रामीणों के हौसले नहीं डिगा सका। उलटा, पुलिस की भारी तैनाती ने आग में घी का काम किया है और आंदोलन की धार और पैनी हो गई है।

ठिठुरती रातें, जलते अलाव और अडिग संकल्प : पिछले चार दिनों से तापमान गिर रहा है, लेकिन ग्रामीणों का पारा चढ़ा हुआ है। बूढ़े, बच्चे और जवान – सब खुले आसमान के नीचे अलाव के सहारे रातें काट रहे हैं। इनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ़ आज की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को बेघर होने से बचाने की है।
ग्रामीणों की दो टूक :
“सरकार हमें मुआवजे का लालच न दे। हमें कोयले की कालिख नहीं, अपने खेत और जंगल चाहिए। जब तक यह अवैध जनसुनवाई पूरी तरह निरस्त (Cancel) नहीं होती, हम यहाँ से एक इंच नहीं हिलेंगे। यह शांतिपूर्ण सत्याग्रह है, लेकिन हमारे सब्र का इम्तिहान न लिया जाए।”
क्या है पूरा मामला? – गारे-पेलमा सेक्टर-1 कोल ब्लॉक के लिए आयोजित इस जनसुनवाई का विरोध 14 गाँव (धौराभांठा, डोलनारा, बगारिया आदि) कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पेसा कानून (PESA Act) और ग्राम सभा की अनुमति के बिना, कॉर्पोरेट के दबाव में जबरन यह सुनवाई थोपी जा रही है। वे अपनी उपजाऊ जमीन और ‘जल-जंगल-जमीन’ को कॉर्पोरेट मुनाफे की भेंट चढ़ाने को तैयार नहीं हैं।
तमनार के धौराभांठा में स्थिति विस्फोटक लेकिन नियंत्रण में है। एक तरफ ‘विकास’ की फाइलें लिए प्रशासन है, तो दूसरी तरफ अपने ‘विनाश’ को रोकने के लिए दीवार बनकर खड़ी जनता। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन जनभावना का सम्मान करते हुए पीछे हटता है, या फिर जोर-जबर्दस्ती का रास्ता अपनाकर हालात को और बिगाड़ता है।
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