दावों की राख पर ‘लाल सलाम’ : बस्तर के ‘नक्सल-मुक्त’ होने के दावों के बीच कांकेर में धधकीं तीन पोकलेन, लाल पर्चों ने सुरक्षा तंत्र को घेरा…

रायपुर। 31 मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को सशस्त्र नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत पर कांकेर के जंगलों से उठते काले धुएं ने तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। लोहत्तर थाना क्षेत्र के चेमल स्थित पुष्प स्टील लिमिटेड की लौह अयस्क खदान में आधी रात को सुनियोजित अंदाज में तीन भारी पोकलेन मशीनों को आग के हवाले कर दिया गया। सुबह जब खदान पहुंचे कर्मचारियों ने करोड़ों की मशीनों को कंकाल बने देखा, तो इलाके में सनसनी फैल गई।
मशीनों के जलने से कहीं ज्यादा गंभीर वह चुनौती है, जो घटनास्थल पर लाल स्याही से लिखे दो पर्चों के रूप में छोड़ी गई है। इन पर्चों के अंत में लिखा ‘लाल सलाम’ और खदान प्रबंधन को दी गई सीधी चेतावनी बस्तर के उसी खौफ की गवाही दे रही है, जिसे आधिकारिक बयानों में ‘बीता हुआ कल’ करार दिया जा चुका था।
लाल पर्चे में चेतावनी, निशाने पर खदान संचालन – घटनास्थल से बरामद दोनों पर्चे लाल स्याही से लिखे गए हैं। इनमें खदान संचालन को तत्काल रोकने की चेतावनी देते हुए स्पष्ट कहा गया है कि यदि तय मांगें पूरी नहीं हुईं, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। पर्चे पर स्पष्ट रूप से ‘लाल सलाम’ दर्ज है। यह वही चिर-परिचित भाषा और कार्यशैली है, जिसके जरिए लाल कॉरिडोर में दशकों तक विकास कार्यों और खनन परियोजनाओं को बंधक बनाया जाता रहा है।
फाइलों में नक्सलवाद का खात्मा, जमीन पर दहकती चुनौती – यह वारदात ऐसे समय हुई है जब केंद्र और राज्य सरकार नक्सल मोर्चे पर ऐतिहासिक जीत के दावे कर रही हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से देश और छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रेखांकित किया था, वहीं प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा ने भी तय समयसीमा के भीतर बस्तर को सशस्त्र हिंसा से पूरी तरह मुक्त करने का दावा दोहराया था।
कांकेर की इस आगजनी ने सीधे तौर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या मंचों से किए गए दावों और बस्तर के अंदरूनी इलाकों की जमीनी हकीकत में कोई बड़ा फासला है? क्या नक्सलियों की कमर सचमुच टूट चुकी है, या वे केवल रणनीति बदलकर खदानों, ठेकेदारों और लेवी नेटवर्क को निशाना बना रहे हैं?
पुलिस का संयम : नक्सली हमला या लेवी सिंडिकेट का मुखौटा? – वारदात की सूचना मिलते ही एसडीओपी शेर बहादुर सिंह के नेतृत्व में लोहत्तर पुलिस और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीम ने मौके पर पहुंचकर मुआयना किया और साक्ष्य जुटाए। हालांकि, पुलिस प्रशासन बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है और इसे सीधे नक्सली वारदात करार देने से बच रहा है।
जांच एजेंसियां दोहरे कोण से पड़ताल कर रही हैं :
- नक्सली उपस्थिति: क्या इलाके में नक्सलियों का कोई बैक-अप दस्ता सक्रिय है जो मौजूदगी दर्ज कराने के लिए सॉफ्ट टारगेट चुन रहा है?
- अपराधिक गिरोह का छद्म रूप: क्या किसी स्थानीय आपराधिक सिंडिकेट, अवैध वसूली गिरोह या असंतुष्ट तत्वों ने लेवी वसूलने के लिए नक्सली अंदाज और ‘लाल सलाम’ के पर्चों का सहारा लिया है?
सुलगते तीन बुनियादी सवाल :
- खुफिया तंत्र की चूक: यदि बस्तर का कोना-कोना सुरक्षा बलों की निगरानी में है, तो घने जंगलों के बीच संचालित खदान में अज्ञात तत्व दाखिल होकर इतनी बड़ी आगजनी को अंजाम देकर आसानी से कैसे निकल गए?
- दावों में आत्मसंतोष: क्या नक्सलवाद के खात्मे की तारीख तय करने के दबाव में सुरक्षा मोर्चे पर जरूरत से ज्यादा आत्मसंतोष (Complacency) पनपने लगा है?
- सुरक्षा का भरोसा: जब औद्योगिक प्रतिष्ठान और भारी मशीनरी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो अंदरूनी इलाकों में काम कर रहे आम मजदूरों और ग्रामीणों में व्यवस्था के प्रति भरोसा कैसे कायम होगा?
कागजी घोषणाओं से इतर चेमल खदान की यह आग सिर्फ तीन मशीनों का नुकसान नहीं, बल्कि सुरक्षा तंत्र के लिए एक गंभीर अलार्म है। अब यह पुलिस जांच के नतीजों पर निर्भर करता है कि वह साबित करे कि ‘लाल सलाम’ का यह पर्चा किसी असामाजिक तत्व की चालाकी थी या बस्तर की जमीन के नीचे नक्सलवाद की चिंगारियां आज भी सुलग रही हैं।




