बीएसपी को अडानी समूह को सौंपने की अटकलें : दल्ली राजहरा में बेघर होने का डर और मंडराता संकट

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक परिदृश्य में इन दिनों सुगबुगाहट तेज है। केंद्र सरकार द्वारा स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के अंतर्गत आने वाले भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) को लेकर लगातार चर्चाएं गर्म हैं कि इसे किसी बड़े व्यावसायिक घराने, विशेषकर अडानी समूह को सौंपा जा सकता है। इन अटकलों का सीधा असर बीएसपी को कच्चे लोहे (लौह अयस्क) की आपूर्ति करने वाले बालोद जिले के प्रमुख खनन शहर दल्ली राजहरा पर पड़ रहा है। यहां के निवासियों में भविष्य को लेकर अनिश्चितता और चिंता का माहौल पैदा हो गया है, क्योंकि इस संभावित बदलाव से शहर के अस्तित्व और यहां के हजारों परिवारों के आशियानों पर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं।

दल्ली राजहरा शहर की अनूठी भू-स्वामित्व स्थिति और दशकों पुराना अतिक्रमण
दल्ली राजहरा की भौगोलिक और प्रशासनिक स्थिति बेहद जटिल है। इस शहर का एक बड़ा हिस्सा भारतीय रेलवे के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि शेष क्षेत्र सीधे तौर पर भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) के नियंत्रण में है। यहां स्थानीय स्तर पर व्यक्तिगत राजस्व भूमि की कमी के कारण, दशकों से आम नागरिकों ने इसी भूमि पर अपने आशियाने, दुकानें, गोदाम और अन्य निर्माण खड़े कर दिए हैं।
दिलचस्प पहलू यह है कि वैध कागजातों और पट्टों के अभाव के बावजूद, इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्थायी निर्माण हो चुके हैं। हालांकि भूमि का मालिकाना हक सीधे तौर पर रेलवे और बीएसपी के पास है, लेकिन राज्य शासन द्वारा यहां स्थानीय प्रशासन के रूप में नगर पालिका का गठन किया जा चुका है। नगर पालिका इन अनधिकृत कब्जों और संपत्तियों पर नियमित रूप से मकान, दुकान और व्यावसायिक संस्थानों से टैक्स (कर) की वसूली भी कर रही है, जिससे स्थिति और अधिक पेचीदा हो गई है।

बीएसपी और रेलवे का रुख: नरमी और नोटिस का दौर
बरसों से बिना वैध दस्तावेजों के पनपे इस शहर पर बीएसपी प्रबंधन और रेलवे दोनों का रवैया अलग-अलग समय पर चर्चा का विषय रहा है। एक तरफ जहां बीएसपी प्रबंधन इस बसाहट को लेकर लंबे समय से व्यावहारिक रूप से नरमी बरतता आया है, वहीं दूसरी तरफ रेलवे समय-समय पर सुरक्षा और नियमों का हवाला देते हुए अवैध कब्जाधारियों को जमीन खाली करने के नोटिस जारी करता रहता है। इसके बावजूद, स्थानीय आबादी अपनी आजीविका और आवास की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आश्वासन चाहती है।

अडानी समूह को लेकर चल रही अटकलों का खदानों और स्थानीय जनता पर असर
ताजा राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में उड़ रही अफवाहों के अनुसार, यदि केंद्र सरकार भिलाई स्टील प्लांट का नियंत्रण या प्रबंधन अडानी समूह को सौंपती है, तो इसका सीधा प्रभाव दल्ली राजहरा की लौह अयस्क खदानों पर पड़ना तय है। दल्ली राजहरा खदानें ही बीएसपी की रीढ़ हैं। यदि निजीकरण या नियंत्रण हस्तांतरण की यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो खदानों के संचालन के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव आ सकते हैं। इस संबंध में हमारे द्वारा अडानी समूह के एचआर नीलेश दामाणी से संपर्क किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।
ऐसी स्थिति में, बीएसपी क्षेत्र की सीमा के भीतर दशकों से बसे लाखों लोगों के विस्थापित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। स्थानीय लोगों को डर है कि कॉरपोरेट नियंत्रण के आने के बाद उनके घरों और दुकानों को हटाने की कार्रवाई तेज हो सकती है, जिससे उनके जीवन भर की पूंजी और आशियाने एक झटके में उजड़ जाएंगे।
फिलहाल दल्ली राजहरा में यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक या भू-स्वामित्व का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह हजारों परिवारों के जीवन और भविष्य से जुड़ा एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दा बन गया है। प्लांट के निजीकरण या नियंत्रण परिवर्तन की अनिश्चितता ने शहर के आम नागरिकों को गहरी चिंता में डाल दिया है। स्थानीय जनता और जनप्रतिनिधियों की नजरें अब केंद्र सरकार के आगामी निर्णयों पर टिकी हैं कि वे इस खदान क्षेत्र के भविष्य और वहां बसने वाले लोगों के अधिकारों का किस प्रकार संतुलन बिठाते हैं।




