सारंगढ़ - बिलाईगढ़

बरमकेला में 16वें वित्त पर ‘कमीशन’ का घमासान: बैठक से वॉकआउट, मंत्री से शिकायत; क्या खुद का क्षेत्र छोड़ ‘पराए’ इलाके में रेवड़ी बांट रहे 10 सदस्य?…

  • विपक्ष की दोहरी नीति पर सवाल: सदन में बहस से भागे, बाहर मचा रहे शोर; CEO की रहस्यमयी चुप्पी ने बढ़ाया विवाद

सारंगढ़ -बिलाईगढ़ । जनपद पंचायत बरमकेला में 16वें वित्त आयोग की विकास राशि के आवंटन को लेकर सियासत का सबसे बदरंग चेहरा सामने आ गया है। जनता के टैक्स के पैसे से होने वाले विकास पर जनप्रतिनिधियों की निजी और राजनीतिक खींचतान इस कदर हावी हो चुकी है कि अब सदन से वॉकआउट और वित्त मंत्री की चौखट तक शिकायतों की झड़ी लग चुकी है। भाजपा समर्थित बताए जा रहे 10 जनपद सदस्यों के अचानक बैठक छोड़कर चले जाने के बाद बहुमत से कार्ययोजना तो पारित हो गई, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने ऐसे सुलगते सवाल छोड़ दिए हैं जिनका जवाब देने से अब हर कोई बच रहा है।

सदन से पलायन : जब जनता ने चुनकर भेजा, तो मेज छोड़ क्यों भागे? – लोकतंत्र में सदन बहस, असहमति और अधिकार छीनने का अखाड़ा होता है। अगर 16वें वित्त की कार्ययोजना में पक्षपात या बंदरबांट हो रही थी, तो इन 10 सदस्यों ने बैठक में बैठकर एक-एक बिंदु पर आपत्ति दर्ज क्यों नहीं कराई? वॉकआउट कर मैदान छोड़ देना और फिर बाहर आकर “अन्याय हुआ” का रोना रोना—यह रणनीति है या अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना?

​चर्चा तो यह भी है कि यह पहली बार नहीं है; इससे पहले भी कोरम गिराकर विकास कार्यों को अटकाने की कोशिश की जा चुकी है। वहीं, लगातार 3 बैठकों से गायब रहने वाले सदस्यों पर अब तक वैधानिक कार्रवाई न होना भी प्रशासन की नीयत पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

खुद का क्षेत्र उपेक्षित, दूसरे के इलाके में मेहरबानी: आखिर क्या है खेल? – ​इस पूरे हंगामे के बीच सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि जो सदस्य भ्रष्टाचार और पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं, उनमें से कई ने अपने ही क्षेत्र की जनता के हक पर कैंची चलाकर दूसरे सदस्यों के कार्यक्षेत्र में लाखों के काम प्रस्तावित किए हैं।

  • ​क्या अपने क्षेत्र में विकास की जरूरतें खत्म हो गई हैं?
  • ​या फिर ‘क्षेत्र से बाहर’ राशि खपाने के पीछे तथाकथित ‘कमीशन’ और निजी सांठगांठ का बड़ा खेल चल रहा है?

​जब तक इन आवंटनों का आधार सार्वजनिक नहीं होता, तब तक दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आ रही है।

CEO की भूमिका सवालों के घेरे में : आखिर आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं? – जनपद पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की भूमिका को लेकर भी अंदरखाने चर्चाएं गर्म हैं। बैठक की आधिकारिक कार्यवाही, उपस्थित-अनुपस्थित सदस्यों की सूची, वॉकआउट करने वालों के नाम और पास किए गए प्रस्तावों के कानूनी आधार को आखिर बंद लिफाफे में क्यों रखा गया है?

​नियमों की अनदेखी करने वाले सदस्यों को कारण बताओ नोटिस जारी करने में प्रशासन के हाथ क्यों कांप रहे हैं? क्या कार्ययोजना की स्वीकृति में नियमों की बलि चढ़ाई गई है?

मंत्री ने दी नसीहत, पर सवालों के जवाब बाकी – मामला वित्त मंत्री ओपी चौधरी के दरवाजे तक पहुंचा। मंत्री ने परिपक्वता दिखाते हुए ‘सबको मिलकर चलने’ की सीख दी, लेकिन जमीन पर सवाल वहीं का वहीं खड़ा है। क्या मिलकर चलने का मतलब अनियमितताओं पर पर्दा डालना है? विकास की राशि का बंटवारा किसी की निजी जागीर नहीं है; यह जनता का पैसा है और जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उनके हिस्से का बजट किस आधार पर दूसरे पंचायतों में ट्रांसफर किया गया।

आईना : विरोध करने वाले 10 सदस्यों की कार्ययोजना का कच्चा-चिट्ठा – हंगामा करने वाले सदस्यों ने स्वयं 16वें वित्त में जो कार्ययोजना सौंपी है, उसके आंकड़े खुद कई विरोधाभासों को उजागर करते हैं :

  • रजनी एक्का : डभरा में ₹2.40 लाख, लेकिन अपने क्षेत्र से बाहर पिपरखूंटा में ₹2 लाख और तरकेला पंचायत के छेलभांठा में ₹2 लाख प्रस्तावित।
  • गणेशी चौहान : नावापाली में ₹1 लाख, सिंघारी में ₹2 लाख, लेकिन अपने क्षेत्र से बाहर बोरे पंचायत में ₹1 लाख और डुमरपाली में ₹2.40 लाख दिए।
  • लक्ष्मी चरण सिदार : झाल में ₹2.20 लाख, हट्टपाली में ₹2.20 लाख और छेलभांठा (तरकेला) में ₹2 लाख।
  • राधा सिदार : डभरा पंचायत के लिए ₹6.40 लाख की भारी-भरकम राशि प्रस्तावित।
  • कौशल्या नायक : बार पंचायत में सीधे ₹6.20 लाख का प्रस्ताव।
  • विश्वदेव भोई : पूरेनपाली में ₹4 लाख और डोंगरीपाली में ₹2.50 लाख।
  • दीपमाला जांगड़े : कंडोला में ₹4 लाख और जलगढ़ में ₹2.40 लाख।
  • चंदा मिरि : गोबरसिंहा में ₹5.20 लाख, कतंगपाली (अ) में ₹60 हजार और मूंगलिपाली में ₹60 हजार।
  • तुलसी पटेल : शकरतूँगा में ₹2.40 लाख, धौरादरहा में ₹2 लाख और बीजामाला में ₹2 लाख।
  • आनंद सा : लुकापारा में ₹2.50 लाख, ठेंगागुड़ी में ₹2 लाख और सांकारा में ₹2 लाख।
  • अनिता प्रधान : भठली में ₹2 लाख, सुरसी में ₹2.50 लाख और पोरथ में ₹2 लाख।

जनता का सीधा सवाल : बरमकेला की जनता अब सिर्फ तमाशा नहीं देख रही। सवाल यह नहीं है कि 10 जीते या 15; सवाल यह है कि गांव-गांव में बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते लोगों की अनदेखी कर विकास राशि की यह बंदरबांट किसके इशारे पर हो रही है? प्रशासन को तत्काल पूरी कार्ययोजना श्वेतपत्र की तरह सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि सच सबके सामने आ सके।

Admin : RM24

Investigative Journalist & RTI Activist

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