रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ हाइड्रो प्रोजेक्ट का मामला : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जनहित याचिका खारिज और सुरक्षा राशि जब्त…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ स्थित मांड नदी पर बने 7.5 मेगावाट के छोटे हाइड्रोइलेक्ट्रिक (जलविद्युत) प्रोजेक्ट के खिलाफ दायर की गई बहुचर्चित जनहित याचिका (WPPIL No. 33 of 2026) को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। मुख्य বিচারপতি श्री रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति श्री रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने अपने कड़े फैसले में स्पष्ट किया कि यह याचिका बिना किसी पुख्ता शोध, तथ्यों की अनदेखी और केवल स्व-प्रेरित दस्तावेजों व मीडिया रिपोर्टों के आधार पर दायर की गई थी। अदालत ने याचिका के बेबुनियाद साबित होने पर याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई सुरक्षा राशि (सिक्योरिटी अमाउंट) को जब्त करने का भी बड़ा आदेश दिया है।
याचिकाकर्ता के गंभीर आरोप और याचिका का मुख्य आधार – मामले के अनुसार, धरमजयगढ़ निवासी और पेशे से पत्रकार विवेक कुमार पांडेय ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। उनका मुख्य तर्क यह था कि :
- मेसर्स धनवाड़ा पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा ग्राम भालुपakhना (विकासखंड धरमजयगढ़) में स्थित सरकारी वन भूमि (खसरा नंबर 365, जिसका क्षेत्रफल 0.128 हेक्टेयर है और खसरा नंबर 347, जिसका क्षेत्रफल 0.005 हेक्टेयर है) पर बिना किसी पूर्व वैधानिक अनुमति के गैर-वानिकी गतिविधियां (Non-forestry activities) चलाई जा रही हैं।
- यह पूरा निर्माण कार्य वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की धारा 2 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।
- याचिकाकर्ता का यह भी दावा था कि उन्होंने इस संबंध में कई आरटीआई (RTI) और जनशिकायतें दर्ज कराई थीं, जिस पर फरवरी 2024 में धरमजयगढ़ वन मंडल के Divisional Forest Officer (DFO) द्वारा कंपनी को एक पत्र जारी कर अवैध निर्माण कार्यों को तुरंत रोकने के निर्देश दिए गए थे।
प्रशासनिक जांच और संयुक्त निरीक्षण (Panchnama) में क्या खुला सच? – राज्य सरकार के महाधिवक्ता (Additional Advocate General) श्री Shashank Thakur और प्रतिवादी कंपनियों के वकीलों ने कोर्ट के समक्ष तथ्यात्मक रिटर्न दाखिल किया, जिससे मामले का पूरा सच सामने आया :
- राजस्व भूमि बनाम वन भूमि : सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि विवादित खसरा नंबर 347 और 365 वास्तव में वन विभाग की भूमि नहीं हैं, बल्कि ये राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अधीन ‘बड़े झाड़ के जंगल’ (निस्तार प्रयोजन हेतु आरक्षित राजस्व भूमि) के रूप में दर्ज हैं।
- पंचनामा रिपोर्ट (23 मार्च 2026 और 20 जून 2026) : जनशिकायत पोर्टल पर की गई शिकायत के बाद राजस्व अधिकारियों, वन विभाग के अमले और स्थानीय ग्रामीणों की एक संयुक्त टीम ने मौके पर जाकर गहन निरीक्षण किया और पंचनामा तैयार किया।
- निरीक्षण के निष्कर्ष : जांच रिपोर्ट में यह प्रमाणित हुआ कि उक्त खसरा नंबरों पर कंपनी द्वारा पावर हाउस, पेनस्टॉक या स्विचयार्ड जैसी किसी भी प्रकार की कोई संरचना या निर्माण नहीं किया गया है और न ही एक भी पेड़ काटा गया है। यह भूमि पूरी तरह से खाली पाई गई।
- तहसीलदार की जांच : ‘केलो प्रवाह’ दैनिक समाचार पत्र में 4 जुलाई 2026 को छपी खबरों के बाद तहसीलदार ने भी स्वतंत्र जांच की, जिसमें पुष्टि हुई कि यह भूमि डेढ़ दशक से अधिक पुरानी राजस्व रिकॉर्ड व्यवस्था के तहत निस्तार और दखल रहित श्रेणी में आती है, और हाइड्रो प्रोजेक्ट का निर्माण तय नियमों व वैध स्वीकृतियों के दायरे में हुआ है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां – अदालत ने सुनवाई के दौरान निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर विशेष रूप से जोर दिया:
- अखबार की खबरों को नहीं माना जा सकता ठोस सबूत : हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल मीडिया रिपोर्ट्स, अखबार की कटिंग या प्रारंभिक स्तर पर जारी किए गए पत्रों को आधार बनाकर अदालत में तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते, जब तक कि मौके पर उसकी पुष्टि न हो।
- सक्षम अधिकारियों की रिपोर्ट सर्वोपरि : न्यायालय ने माना कि प्रशासनिक और सांविधिक अधिकारियों द्वारा समय-समय पर किए गए संयुक्त निरीक्षण और पंचनामों में यह साफ हो चुका है कि मौके पर कोई अवैध या गैर-वानिकी गतिविधि नहीं चल रही थी।
- जनहित याचिका के दायरे की सीमा : अदालत ने रेखांकित किया कि जनहित याचिका (PIL) एक संवेदनशील कानूनी साधन है, जिसका उपयोग बिना किसी ठोस और पुख्ता सामग्री के केवल भ्रम फैलाने या सनसनीखेज मामलों को हवा देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
- अधिकारियों ने नहीं बरती लापरवाही : कोर्ट ने यह भी नोट किया कि चूंकि प्रशासन और संबंधित विभागों ने याचिकाकर्ता की शिकायतों पर तुरंत संज्ञान लेते हुए कई बार स्थल जांच कराई और रिपोर्ट पेश की, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया।
इन सभी पुख्ता तर्कों, दस्तावेजों और संयुक्त निरीक्षण रिपोर्टों के आधार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता की सुरक्षा राशि को जब्त करने का सख्त निर्देश दिया।




