विशेष रिपोर्ट : तमनार की ‘दमघोंटू’ हकीकत- विकास की वेदी पर बलि चढ़ता पर्यावरण और सिस्टम की खामोशी…

तमनार, रायगढ़। छत्तीसगढ़ का औद्योगिक गढ़ कहा जाने वाला तमनार आज ‘प्रदूषण की राजधानी’ बनने की कगार पर है। लेकिन आज चर्चा कोयले की कालिख की नहीं, बल्कि उस आक्रोश की है जो तमनार थाने के सामने उमड़ा है। यह घेराव सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ है जो उद्योगों की चिमनियों से निकलते धुएं में अंधा हो चुका है।
कानून की दोहरी परिभाषा – रसूखदारों को ‘कवच’, जनता को ‘कचहरी’ : तमनार का सबसे बड़ा सवाल प्रशासन के चेहरे पर तमाचे की तरह है – क्या कानून सिर्फ आंदोलनकारियों के लिए है? जब ग्रामीण अपने संवैधानिक हक के लिए आवाज उठाते हैं, तो उन पर मुकदमे लाद दिए जाते हैं, उन्हें थानों में बिठाया जाता है। लेकिन जब बड़ी औद्योगिक इकाइयां सरेआम पर्यावरण नियमों (Environment Protection Act) की धज्जियां उड़ाती हैं, फ्लाई ऐश (राखड़) को नदियों और खेतों में बहाती हैं, तब प्रशासन की ‘कानूनी सक्रियता’ अचानक लकवाग्रस्त क्यों हो जाती है?
पर्यावरण का कत्ल और ‘जुर्माने’ का खेल : आंदोलनकारियों की मांग बेहद स्पष्ट और तार्किक है : सिर्फ नोटिस नहीं, आपराधिक मुकदमा चाहिए।
- नियमों का उल्लंघन : उद्योगों द्वारा निर्धारित मापदंडों से कहीं ज्यादा प्रदूषण फैलाया जा रहा है।
- दोषियों पर नरमी : पर्यावरण विभाग अक्सर कागजी खानापूर्ति और मामूली जुर्माना लगाकर उद्योगों को ‘क्लीन चिट’ दे देता है।
- मांग : क्या जल-जंगल-जमीन को बर्बाद करना ‘आपराधिक कृत्य’ नहीं है? अगर है, तो अब तक उद्योगपतियों और प्रबंधन पर एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं हुई?
तमनार की आवाज को दबाने की साजिश? – तमनार के गांवों में सांस लेना दूभर हो गया है। भूजल स्तर गिर रहा है और खेती बर्बाद हो रही है। जब जनता ने संगठित होकर जवाब मांगना शुरू किया, तो उन्हें डराने-धमकाने का दौर शुरू हुआ। आज का थाना घेराव इस बात का प्रमाण है कि तमनार की आवाज अब दबने वाली नहीं है। जनता अब यह जान चुकी है कि उद्योग और प्रशासन के बीच का गठजोड़ उनके भविष्य को गिरवी रख चुका है।
प्रशासन से सीधे सवाल (The Big Questions)
- सवाल 1 : क्या उद्योग और उनके रसूखदार मालिक भारत के संविधान और पर्यावरण कानूनों से ऊपर हैं?
- सवाल 2 : फ्लाई ऐश के अवैध डंपिंग से नष्ट हो रही उपजाऊ जमीन का जिम्मेदार कौन है?
- सवाल 3 : प्रशासन उद्योगों के ‘प्रवक्ता’ की तरह काम करना कब बंद करेगा?
“तमनार का संघर्ष आज पूरे छत्तीसगढ़ के लिए नजीर है। यह लड़ाई सिर्फ एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के फेफड़ों को बचाने की जंग है।”
जवाब तो देना होगा! – तमनार आज थाने का घेराव कर केवल अपना गुस्सा जाहिर नहीं कर रहा, बल्कि पूरे तंत्र से जवाब मांग रहा है। यह आंदोलन स्पष्ट संदेश देता है कि विकास की कीमत विनाश से नहीं चुकाई जाएगी। यदि अब भी दोषियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं हुए, तो यह आक्रोश तमनार की गलियों से निकलकर राजधानी की सत्ता तक पहुंचेगा।
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