बालोद में द्विफसली योजना के तहत सरसों बीज वितरित : एक तरफ उन्नत खेती का संदेश, तो दूसरी तरफ अन्नदाताओं का अपमान!

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद/गुरूर। जिले में किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और रबी सीजन में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के दावे कितने खोखले हैं, इसकी एक बानगी गुरूर विकासखंड के ग्राम नवागांव में देखने को मिली। कृषि विभाग द्वारा यहां ‘द्विफसली योजना’ के अंतर्गत किसानों को उन्नत किस्म के सरसों बीज के मिनीकिट वितरित करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस पहल का मुख्य उद्देश्य एकल फसल प्रणाली के स्थान पर किसानों को द्विफसली पद्धति अपनाने और तिलहन उत्पादन की ओर अग्रसर करना था।
कार्यक्रम के दौरान कृषि विभाग के अधिकारियों ने उपस्थित कृषकों को उन्नत बीज के महत्व, खेत की तैयारी और बोआई की वैज्ञानिक तकनीकों से अवगत कराया। अधिकारियों ने बताया कि इस योजना के तहत गुणवत्तापूर्ण सरसों बीज की खेती करने से कम लागत और सीमित सिंचाई में भी बेहतर पैदावार हासिल की जा सकती है। इससे न केवल किसानों की आय में इजाफा होगा, बल्कि क्षेत्र में तिलहन फसलों का रकबा भी बढ़ेगा। शासन की इस योजना से समय पर उन्नत बीज मिलने पर किसानों ने शुरुआत में उत्साह भी जताया और कृषि अमले ने भी संतुलित खाद प्रबंधन व आधुनिक तकनीकों को अपनाकर समृद्ध किसान बनने का आह्वान किया।

अन्नदाताओं का सम्मान या अपमान? कुर्सी के बजाय दरी पर बैठाने की विडंबना
लेकिन, इस प्रशासनिक आयोजन का एक दूसरा पहलू बेहद शर्मनाक और व्यवस्था की पोल खोलने वाला रहा। जिस अन्नदाता के पसीने से देश का पेट भरता है और जिसकी बदौलत योजनाएं फलीभूत होती हैं, उसी किसान के साथ विभाग का रवैया दोहरे दर्जे का साबित हुआ। समाचार के अनुसार, बैठक में मौजूद सभी ग्रामीण कृषकों को बैठने के लिए कुर्सियां मुहैया कराने के बजाय सीधे जमीन पर दरी बिछाकर बैठा दिया गया।
क्या कृषि विभाग के पास फंड की कमी थी जो वे किराए की कुर्सी जुटा नहीं पाए? क्या शासन-प्रशासन के पास किसानों के मान-सम्मान के लिए एक अदद कुर्सी का बजट कभी नहीं होता? जिले में जहां कहीं भी किसानों के लिए इस तरह की बैठकें या कार्यक्रम आयोजित होते हैं, अन्नदाताओं को अक्सर जमीन पर दरी बिछाकर ही बिठाया जाता है। क्या किसानों के प्रति अधिकारियों का यह रवैया उनकी उपेक्षा और व्यवस्था की संवेदनहीनता को नहीं दर्शाता? यह समझ से परे है कि जो अधिकारी मंचों से किसानों को ‘समृद्ध’ बनाने के बड़े-बड़े भाषण देते हैं, वे हकीकत में उन्हीं किसानों को बुनियादी सम्मान देने से क्यों कतराते हैं?
जिला कलेक्टर से सख्त अपील : भविष्य में न हो ऐसा भेदभाव
इस प्रकार की घटनाएं न केवल शासन की मंशा पर पानी फेरती हैं, बल्कि किसानों के आत्मसम्मान को भी गहरी ठेस पहुंचाती हैं। एक तरफ सरकार किसानों को ‘अन्नदाता’ कहकर उनकी रीढ़ मजबूत करने के दावे करती है, तो वहीं मैदानी अमले का यह दोगला व्यवहार इसके बिल्कुल विपरीत संदेश देता है।
इस समाचार के माध्यम से जिला कलेक्टर महोदया “श्रीमती दिव्या उमेश मिश्रा” का ध्यान इस गंभीर और संवेदनहीन लापरवाही की ओर आकर्षित किया जा रहा है। उम्मीद की जाती है कि जिला प्रशासन इस मामले का संज्ञान लेगा और भविष्य के लिए सख्त निर्देश जारी करेगा, ताकि जिले में किसी भी सरकारी बैठक या कार्यक्रम में अन्नदाताओं के साथ ऐसा भेदभावपूर्ण और अपमानजनक बर्ताव दोबारा कभी न दोहराया जाए। किसानों को योजनाओं के लाभ के साथ-साथ उनका सामाजिक सम्मान भी मिलना उतना ही जरूरी है।




