राजहरा क्षेत्र से ‘विकास पलायन’: नेताजी की मेहरबानी या सियासत की बलि चढ़ा खनिजांचल का भविष्य?

फिरोज अहमद खान (पत्रकार)
बालोद/डौंडी/राजहरा। खनिज संपदा से मालामाल छत्तीसगढ़ का डौंडी-दल्ली राजहरा क्षेत्र इन दिनों अपनी माइनिंग की अकूत दौलत के लिए नहीं, बल्कि विकास के प्रोजेक्ट्स के ‘रफूचक्कर’ होने के नायाब रिकॉर्ड के लिए सुर्खियों में है। यहाँ के नेताओं की ख़ामोशी और कुर्सी बचाने वाली कूटनीति ने इस ऐतिहासिक माइनिंग टाउनशिप को विकास के मामले में ऐसा ‘कब्रिस्तान’ बना दिया है, जहाँ आने वाली हर अच्छी सौगात किसी जादू की तरह गायब हो जाती है। ताजा मामला ग्राम पथराटोला में 5 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले आधुनिक विज्ञान केंद्र (Science Center) का है, जिस पर शुरू हुए राजनीतिक घमासान ने क्षेत्र की सुसुप्त जनता को झकझोर कर रख दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या दल्ली राजहरा और डौंडी के विकास का खात्मा करने की कोई सुनियोजित सुपारी ली जा चुकी है?
दल्ली राजहरा से ‘रफूचक्कर’ होते प्रोजेक्ट्स: इतिहास खुद को दोहरा रहा है!
यह कोई पहली बार नहीं है जब दल्ली राजहरा के हिस्से की खुशियों को किसी और की झोली में डाल दिया गया हो। इस क्षेत्र के इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो दर्दनाक दास्तां नजर आती है:
- कागज फैक्ट्री का सपना : कभी इस इलाके में एक बड़ी कागज फैक्ट्री लगने वाली थी, लेकिन राजनीतिक कुटिलता और दूरदर्शिता की कमी के चलते उसे रातों-रात मध्य प्रदेश के अमलाई में शिफ्ट कर दिया गया।
- जिला मुख्यालय की अदला-बदली : कभी वह स्वर्णिम दौर भी था जब जिला मुख्यालय भी दल्ली राजहरा में ही बनना प्रस्तावित था, लेकिन शातिर राजनीतिक चालों ने उसे यहाँ से उठाकर बालोद के सिवनी गाँव में स्थापित करवा दिया। उस समय के सत्ताधारी पार्टी के दल्ली राजहरा के “दो कद्दावर नेताओं” ने बालोद के राजनीतिक आकाओं के आगे घुटने टेक चुप्पी साध ली थी।
- कार्यालयों का पलायन : धीरे-धीरे तहसील कार्यालय और एसडीएम कार्यालय भी दल्ली राजहरा के अधिकार क्षेत्र से छिनकर डौंडी की ओर शिफ्ट हो गए और हमारे स्थानीय ‘महानुभाव’ चैन की बंशी बजाते रहे।
अब जबकि डौंडी विकासखंड के ग्राम पथराटोला में लगभग 5 करोड़ की लागत से क्षेत्र के बच्चों और युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए ‘विज्ञान केंद्र’ जैसी महत्वपूर्ण शैक्षणिक सौगात आ रही थी, तो बालोद के एक वरिष्ठ नेताजी ने इस पर आपत्ति का झंडा बुलंद कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस विरोध ने जनता के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ये बालोदियन नेताजी इस विज्ञान केंद्र को कहाँ उठा कर ले जाना चाहते हैं? क्या इन नेताओं की कुंठाओं का शिकार हमेशा यहाँ के युवा व मासूम बच्चे ही होंगे?
डौंडी व दल्ली राजहरा के ‘धनलोलुप’ नेता : एसी कमरों के राजा और जनता के नाम पर सन्नाटा!
दल्ली राजहरा के तथाकथित राजनीतिक आकाओं की ख़ामोशी पर अब जनता खुलकर ‘कटाक्ष’ करने लगी है। यहाँ के नेताओं की स्थिति ऐसी हो गई है कि जब भी जनता के अधिकारों और क्षेत्र के विकास को लूटने की बारी आती है, तो ये नेताजी ऐसे भूमिगत हो जाते हैं जैसे मानों इन्हें सियासत की नहीं, बल्कि मौनव्रत की डिग्री मिली हो।
तहसील चली गई—नेताजी चुप! एसडीएम ऑफिस छिन गया—नेताजी की जुबान पर ताला लग गया!
बटालियन का मुकाम बदला— नेताजी ने एसी कमरे में बैठकर शायद चाय की चुस्कियाँ लीं!
और अब जब युवाओं व बच्चों के भविष्य से जुड़े ‘विज्ञान केंद्र’ पर राजनीति का ग्रहण लग रहा है, तो ये तथाकथित कद्दावर नेता ऐसे छुपकर बैठे हैं जैसे किसी ने इनकी राजनीतिक चाबी ही निकाल ली हो।
इन ‘धनलोलुप’ और कुर्सी-लोभी नेताओं को सिर्फ अपने निजी स्वार्थ, बंगलों और ठेकों से मतलब है। इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यहाँ का युवा वर्ग बेरोजगारी की आग में झुलस रहा है। रोजगार के अवसर छिन जाने के कारण पेट की आग बुझाने के लिए मजबूरी में कुछ युवा गलत रास्तों पर भटक रहे हैं, तो बाकी बचा युवा वर्ग शराब, अफीम, गांजा, नशे की गोलियों और नशीली कफ सिरप के दलदल में धकेलकर अपना जीवन अंधकारमय बना रहा है। लेकिन मजाल है कि हमारे इन ‘महान नेताओं’ के माथे पर एक शिकन भी आ जाए! जनता इन्हें चुनकर भेजती है क्षेत्र की नुमाइंदगी करने के लिए, लेकिन ये तो केवल अपने आकाओं के इशारे पर दल्ली राजहरा की अर्थी सजवाने में सबसे आगे नजर आते हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार पर गहरी चोट
किसी भी क्षेत्र में जब कोई बड़ा शासकीय संस्थान, बटालियन या केंद्र स्थापित होता है, तो उसका सीधा सकारात्मक प्रभाव वहाँ की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि इसी क्षेत्र में अन्य बड़ी परियोजनाएं और 15वीं वाहिनी जैसी बटालियनें टिकी रहतीं, तो तस्वीर कुछ और होती:
- व्यापार और बाजार में उछाल : 800 से 1,000 जवानों और उनके परिवारों की दैनिक जरूरतों (राशन, कपड़े, ग्रॉसरी, इलेक्ट्रॉनिक्स) से स्थानीय व्यापारियों की तिजोरियाँ भरतीं और बाजार में रौनक रहती।
- रियल एस्टेट और किराया बाजार : आवासीय परिसरों की कमी के चलते अधिकारियों और जवानों के परिवार शहर में किराए के मकान लेते, जिससे मकान मालिकों को नियमित आय का जरिया मिलता।
- स्थानीय रोजगार के द्वार : परिवहन, खान-पान, निर्माण, सुरक्षा और मेंटेनेंस जैसे सहायक क्षेत्रों में स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के हजारों अवसर स्वतः पैदा होते।
- शहरी हलचल और समृद्धि : सेल (SAIL) और माइंस की गतिविधियों के बीच एक स्थायी बड़े संस्थान का होना इस माइनिंग टाउनशिप की डूबती आर्थिक नैया को पार लगाने में मददगार साबित होता।
लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक कुचक्रों ने हर बार दल्ली राजहरा और डौंडी के हक पर डाका डाला है।
आदिवासी समाज और स्थानीय जनता की दो टूक चेतावनी: “अब नहीं सहेंगे!”
पथराटोला में प्रस्तावित विज्ञान केंद्र के विरोध और रोक लगाने की माँग के खिलाफ अब आदिवासी समाज और क्षेत्र की आम जनता सड़कों पर उतरने का मन बना चुकी है। जनता का सवाल बिल्कुल स्पष्ट है : “क्या खनन प्रभावित क्षेत्र की जनता की मूलभूत समस्याओं का बहाना बनाकर युवाओं और बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेलना उचित है?”
निस्संदेह, डौंडी ब्लॉक की जनता लंबे समय से गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। यहाँ के लोग लाल पानी का अभिशाप झेल रहे हैं, भीषण प्रदूषण, दूषित पेयजल, जर्जर सड़कें, जल निकासी की बदइंतजामी, लचर स्वास्थ्य व्यवस्था और शिक्षा की बदहाली से त्रस्त हैं। डीएमएफ (DMF) फंड के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार और बंदरबांट को लेकर जनता में भारी रोष है। इन मुद्दों पर आवाज उठाना और आंदोलन करना पूरी तरह जायज है।
परन्तु जनता का यह भी कहना है कि क्या इन तमाम समस्याओं का एकमात्र और अचूक समाधान युवाओं और बच्चों के लिए आ रहे ‘विज्ञान केंद्र’ को रोकना है? यदि परियोजना की लागत, पारदर्शिता, वित्तीय नियमों या प्रशासनिक स्वीकृतियों को लेकर कोई संदेह है, तो उसकी उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जाँच करवाई जा सकती है, दस्तावेज सार्वजनिक किए जा सकते हैं, और दोषियों पर गाज गिराई जा सकती है। लेकिन मूलभूत सुविधाओं के संघर्ष के नाम पर बच्चों की शैक्षणिक सौगात छीनने की साजिश रचना, सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का घटिया राजनीतिक स्टंट के अलावा कुछ नहीं है।
आज जरूरत इस बात की है कि क्षेत्र की जनता इन ढोंगी और मौकापरस्त नेताओं के चेहरे को पहचाने, जो पर्दे के पीछे रहकर दल्ली राजहरा और डौंडी के वजूद को दीमक की तरह चाट रहे हैं। यदि इस बार भी जनता चुप बैठी, तो वह दिन दूर नहीं जब यह ऐतिहासिक क्षेत्र केवल खंडहर और पुरानी यादों का मोहल्ला बनकर रह जाएगा।
आदिवासी समाज और स्थानीय युवाओं ने साफ कर दिया है कि बच्चों के भविष्य और शिक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी षड्यंत्र को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि विज्ञान केंद्र के निर्माण में कोई भी रोड़ा अटकाने की कोशिश की गई, तो इस लड़ाई को ब्लॉक स्तर से लेकर सीधे राजधानी रायपुर तक सड़क पर उतरकर लड़ा जाएगा। अब देखना यह है कि क्या नींद से जागे लोग अपने हक की लड़ाई खुद लड़ेंगे, या फिर इन मूक-बधिर नेताओं के भरोसे अपने युवाओं और बच्चों का भविष्य भी दांव पर लगा देंगे?




