राख के ढेर और सुलगता सच : पुतला तो जल गया, पर समाज की नाभि में अब भी जिंदा है रावण!….

रायगढ़। कल विजयादशमी के महापर्व पर संस्कारधानी के रामलीला मैदान, नटवर स्कूल परिसर और मिनी स्टेडियम में साठ-सत्तर फीट ऊंचे पुतले धू-धू कर जल उठे। गगनभेदी जयकारों, ढोल-नगाड़ों और आतिशबाजी के बीच लाखों के जनसैलाब ने असत्य पर सत्य की जीत का जश्न मनाया।
लेकिन, उस शांत हो चुके बारूदी धुएं और हवा में तैरती राख के बीच एक ऐसा चुभता हुआ सवाल टंगे रह गया है, जो किसी भी संवेदनशील इंसान के कलेजे को चीर देता है- जब रावण त्रेतायुग में ही श्रीराम के बाणों से मारा जा चुका है, तो हम आज किसे जला रहे हैं? क्या बाहर खड़े बांस-कागज के ढांचे को फूंक देने से समाज की गंदगी साफ हो जाती है, या यह सिर्फ एक सालाना पाखंड है, जहां रावण का पुतला मैदान में जलता है और हमारे भीतर का रावण मंद-मंद मुस्कुराते हुए सुरक्षित घर लौट आता है?
देवी पूजने वाले मुल्क में महफूज कौन?
एक तरफ नवरात्र में कन्याओं के पांव पखार कर उन्हें ‘जगदम्बा’ माना जाता है, तो दूसरी तरफ अस्पतालों से लेकर गलियों तक मासूम बच्चियों की चीखें गूंजती हैं।
लंकापति रावण ने माता सीता का हरण जरूर किया था, लेकिन अशोक वाटिका में बिना उनकी सहमति के उन्हें स्पर्श तक नहीं किया था। आज के वहशी दरिंदों ने तो उस रावण की मर्यादाओं को भी पाताल में धकेल दिया है।
वे बलात्कारी और दरिंदे भी इसी समाज का हिस्सा हैं—संभव है कि कल वे भी नए कपड़े पहनकर रावण दहन देखने की भीड़ में शामिल रहे हों। जब तक देश की बेटी आधी रात को सुरक्षित नहीं चल पाती, तब तक यह पुतला दहन महज़ एक खोखला दिखावा है।
सरकारी चौखटों पर दलालों की समानांतर हुकूमत – अधर्म केवल देह की हिंसा में नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सड़न में भी है जो आम आदमी की हड्डियों तक को निचोड़ रही है।
एक राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र या जमीन के नामांतरण के लिए गरीब की चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन दफ्तरों के इर्द-गिर्द बिचौलियों की समानांतर दुकानें सजी रहती हैं।
किसी की लाचारी पर जेबें भरने वाले, फाइलों को अटकाकर रिश्वत की सौदेबाजी करने वाले क्या किसी रावण से कम हैं? टेबल के नीचे से जाने वाला हर एक नोट गरीब के हक का खून है।
न्याय का गला घोंटता षड्यंत्र : न्याय व्यवस्था समाज की अंतिम उम्मीद होती है, मगर आज रंजिश, ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली के लिए थानों में झूठे मुकदमे दर्ज कराना एक गंभीर नासूर बन चुका है।
कानून (BNS और पूर्ववर्ती IPC) में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ सख्त प्रावधान हैं, पर जमीनी स्तर पर इनका इस्तेमाल न के बराबर होता है।
जब किसी बेकसूर की चीखें थानों की दीवारों से टकराकर लौट जाती हैं और रसूख के बल पर सच का गला घोंटा जाता है, तब क्या खाकी की मर्यादा पर बैठा रावण तांडव नहीं कर रहा होता?
स्क्रीन के पीछे छिपे आधुनिक मारीच : त्रेतायुग में रावण ने छल के लिए मारीच को सोने के हिरण का रूप दिया था; आज का साइबर अपराधी मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट के अदृश्य जाल के पीछे छिपकर वही मायावी खेल खेल रहा है।
खून-पसीने की कमाई, बुजुर्गों की पेंशन और बेटियों की शादी का पैसा एक फर्जी कॉल या ‘डिजिटल अरेस्ट’ के डर से सेकंडों में लुट रहा है, जिससे लोग आत्महत्या तक करने को मजबूर हैं।
यह वह अदृश्य रावण है जो बिना कोई अस्त्र उठाए, सिर्फ मक्कारी से हंसते-खेलते परिवारों को सड़क पर ला खड़ा कर रहा है।
जब तक भीतर का अंधकार नहीं मिटेगा, दहन अधूरा है! कल शाम रायगढ़ के मैदानों में बारूद का शोर शांत हो गया, पुतले जलकर मिट्टी में मिल गए और मैदान खाली हो गए।
अब खुद से पूछिए – क्या आज सुबह इस शहर की सड़कें महिलाओं के लिए महफूज हो गईं? क्या सरकारी दफ्तरों से दलाल गायब हो गए? क्या साइबर ठगों की उंगलियां रुक गईं?
यदि जवाब ‘ना’ है, तो मान लीजिए कि कल हमने सिर्फ कागज का एक पुतला जलाया है; असली रावण तो हमारे आसपास, हमारी व्यवस्था में और हमारे अपने सीने के भीतर अट्टहास कर रहा है। रावण को मैदानों में नहीं, अपने भीतर के अहंकार, लोभ और भ्रष्टाचार की नाभि में मारना होगा।




