सारंगढ़-बिलाईगढ़ में सहकारिता का सबसे बड़ा ‘भूतिया’ खेल: जब समिति पंजीकृत ही नहीं, तो धान किसने खरीदा और भुगतान किसे हुआ?…

- कागजों से ‘गायब’ हुई डोंगरीपाली समिति, आरटीआई में खुलासा होते ही विभाग के उड़े होश; कलेक्टर कोर्ट तक पहुंचा मामला…
सारंगढ़-बिलाईगढ़। छत्तीसगढ़ के नवगठित जिले सारंगढ़-बिलाईगढ़ में सहकारिता और धान खरीदी व्यवस्था की साख पर गहरा आघात लगा है। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत हुए एक आधिकारिक खुलासे ने पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। जिस डोंगरीपाली सेवा सहकारी समिति के नाम पर पिछले तीन वर्षों से हजारों क्विंटल धान की सरकारी खरीदी, करोड़ों रुपये का भुगतान, बारदाना-परिवहन का आबंटन और खाद-बीज का वितरण दर्शाया जाता रहा, वह समिति सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित विकासखंड में पंजीकृत ही नहीं है।

सहायक आयुक्त सहकारिता एवं सहायक पंजीयक सहकारी संस्थाएं, सारंगढ़-बिलाईगढ़ द्वारा जारी आधिकारिक पत्र (दिनांक 25/08/2026) ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि “विकासखंड बरमकेला में सेवा सहकारी समिति मर्यादित डोंगरीपाली पंजीकृत समिति नहीं है, अतः जानकारी दिया जाना संभव नहीं है।” इस एक पत्र ने शासन के समर्थन मूल्य अभियान और सरकारी खजाने की सुरक्षा पर कई तीखे सवाल दाग दिए हैं।
किसानों के नाम, करोड़ों के भुगतान और ऑडिट की मांगी थी कुंडली – ग्राम गोबरसिंहा निवासी आरटीआई कार्यकर्ता अजय कुमार साहू ने डोंगरीपाली सेवा सहकारी समिति के पिछले तीन वित्तीय वर्षों का कच्चा-चिट्ठा मांगा था:
- धान खरीदी का पूरा लेखा-जोखा: वर्ष 2022-23, 2023-24 एवं 2024-25 में पंजीकृत किसानों की सूची, बेचे गए धान की मात्रा और सीधे बैंक खातों में किए गए भुगतान का ब्योरा।
- उपार्जन व्यय: धान उपार्जन के दौरान इस्तेमाल हुए बारदाने, तौल, लोडिंग-अनलोडिंग और परिवहन मद में खर्च की गई राशि।
- कृषि इनपुट का रिकॉर्ड: वर्ष 2022 से अब तक खाद, बीज एवं अन्य कृषि सामग्री के आधिकारिक स्टॉक एवं वितरण रजिस्टर की प्रमाणित प्रतियां।
- प्रशासनिक व वित्तीय नियंत्रण: समिति में पदस्थ प्रबंधक, कंप्यूटर ऑपरेटर और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति आदेश, समिति के बैंक खाते, दैनिक कैश बुक और विगत वर्षों की आधिकारिक ऑडिट रिपोर्ट।
प्रशासनिक लीपापोती: RTI धारा 6(3) का सीधा उल्लंघन – सहकारिता विभाग ने सीधे तौर पर “जानकारी देना संभव नहीं है” कहकर हाथ खड़े कर दिए, जबकि आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 6(3) स्पष्ट कहती है कि यदि मांगी गई जानकारी संबंधित लोक प्राधिकारी के पास नहीं है, तो आवेदन को 5 दिनों के भीतर सक्षम विभाग या कार्यालय को अंतरित किया जाना अनिवार्य है।
विभाग ने यह तक स्पष्ट करने की जहमत नहीं उठाई कि:
- यदि समिति बरमकेला में पंजीकृत नहीं है, तो इसका मूल पंजीयन क्रमांक और वास्तविक कार्यक्षेत्र कौन सा है?
- क्या डोंगरीपाली किसी अन्य प्राथमिक कृषि साख समिति की उप-शाखा या अस्थाई उपार्जन केंद्र थी?
- अगर समिति अस्तित्वहीन है, तो इसके नाम से करोड़ों की वित्तीय निकासी और खाद-बीज का वितरण किसके हस्ताक्षरों से हुआ?
कलेक्टर एवं प्रथम अपीलीय न्यायालय की शरण में मामला – मामला केवल जानकारी दबाने का नहीं, बल्कि सरकारी उपार्जन में कागजी समितियों के जरिए भारी अनियमितता की आशंका का रूप ले चुका है। यह प्रकरण अब न्यायालय कलेक्टर एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी सारंगढ़-बिलाईगढ़ के समक्ष विचाराधीन है (संदर्भ क्रमांक/2398/वाचक-2/2026)।
यदि डोंगरीपाली समिति का वैधानिक पंजीयन विकासखंड के अभिलेखों में दर्ज नहीं है, तो तीन सत्रों में बेचे गए धान के आंकड़े, जारी हुए करोड़ों रुपये के किसान भुगतान और मिलर्स को जारी किए गए डीओ (Delivery Order) की वैधानिकता शून्य मानी जानी चाहिए। अब सबकी निगाहें प्रथम अपीलीय अधिकारी पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय प्रशासनिक व आर्थिक अपराध जांच के आदेश दिए जाते हैं, या फिर कागजी गोलमाल के सहारे सच को दबाने का प्रयास जारी रहेगा।




