कानून ‘हथियार’ नहीं : कर्नाटक हाईकोर्ट ने रद्द किया 498-A केस; कहा – “वैवाहिक अनबन अपराध नहीं”…

बेंगलुरु। कर्नाटक हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में आईपीसी की धारा 498-A (क्रूरता) के बढ़ते दुरुपयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पति और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि “कानून आपसी असंगति (Incompatibility) या अपूर्ण विवाह को अपराध नहीं मानता।”
मामला क्या था? – याचिकाकर्ता अबुज़र अहमद और उनकी पत्नी अमेरिका में छह साल तक साथ रहे। जनवरी 2023 में भारत लौटने के बाद, पत्नी ने पति, सास-ससुर और देवर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और क्रूरता का मामला दर्ज कराया। पुलिस ने आनन-फानन में एफआईआर दर्ज कर पति के खिलाफ ‘लुक-आउट सर्कुलर’ जारी कर दिया, जिससे वह विदेश वापस नहीं जा सका।
कोर्ट की तीखी टिप्पणियां : अदालत ने जब शिकायत की समीक्षा की, तो पाया कि आरोप भोजन की आदतों, कपड़ों की पसंद और टीवी देखने जैसे छोटे विवादों पर आधारित थे। इस पर जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा:
- सटीक दायरा: “धारा 498-A वैवाहिक समस्याओं का ‘यूनिवर्सल इलाज’ नहीं है। यह केवल गंभीर, जानलेवा क्रूरता या दहेज उत्पीड़न के लिए है।”
- कानून का दुरुपयोग: “छोटी-मोटी पारिवारिक नोक-झोंक को आपराधिक रंग देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
- पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल: कोर्ट ने बिना प्रारंभिक जांच के लुक-आउट सर्कुलर जारी करने को ‘चौंकाने वाला’ बताया।
फैसला : कोर्ट ने पाया कि शिकायत में न तो दहेज की मांग का कोई सबूत था और न ही कोई गंभीर क्रूरता। सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट ने पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया और पति व उसके परिवार को बड़ी राहत दी।




