छत्तीसगढ़ : विधायक के ‘फर्जी’ जाति प्रमाण पत्र पर उबाल, आदिवासी समाज ने दी कलेक्ट्रेट घेरने की चेतावनी…

बलरामपुर–रामानुजगंज। छत्तीसगढ़ के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते के कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। प्रशासन की ‘सुस्ती’ से नाराज आदिवासी समाज ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में समाज ने दो टूक कहा है कि यदि 29 दिसंबर तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उग्र आंदोलन को मजबूर होंगे।
क्या है पूरा मामला? – शिकायतकर्ताओं के अनुसार, विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते के जाति प्रमाण पत्र की वैधता को लेकर 31 अक्टूबर 2025 को सक्षम प्राधिकारी के पास आवेदन दिया गया था। आरोप है कि प्रमाण पत्र फर्जी है और इसे तत्काल निरस्त किया जाना चाहिए। हालांकि, महीनों बीत जाने के बाद भी प्रशासन द्वारा कोई अंतिम फैसला नहीं लिए जाने से क्षेत्र के नागरिकों में भारी आक्रोश है।
प्रशासन पर ‘तारीख पर तारीख’ देने का आरोप : आदिवासी समाज ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आवेदन में उल्लेखित घटनाक्रम इस प्रकार है:
- 17 नवंबर 2025 : प्रशासन ने विधायक को दस्तावेज पेश करने का अंतिम अवसर दिया था।
- 27 नवंबर 2025 : अनावेदक के वकील ने स्थगन याचिका (Stay Petition) पेश की।
- 11 दिसंबर 2025 : मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया गया, लेकिन निर्णय सार्वजनिक नहीं हुआ।
- 29 दिसंबर 2025 : अगली सुनवाई की तिथि तय की गई है।
”प्रशासन जानबूझकर मामले को लटका रहा है। अगर 29 दिसंबर की सुनवाई में प्रमाण पत्र निरस्त नहीं हुआ, तो हम कलेक्ट्रेट के सामने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पोस्टर लेकर प्रदर्शन करेंगे।”
क्षेत्रीय आदिवासी प्रतिनिधि
आंदोलन की रणनीति : शांतिपूर्ण लेकिन उग्र – आदिवासी समाज ने स्पष्ट किया है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे, लेकिन यदि उनकी मांगों की अनदेखी की गई तो आंदोलन ‘उग्र’ रूप ले सकता है। इसकी प्रतिलिपि सरगुजा कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों को भी भेजी गई है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला? – यह विवाद केवल एक प्रमाण पत्र का नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और आदिवासी अधिकारों से जुड़ा है। यदि प्रमाण पत्र फर्जी पाया जाता है, तो विधायक की सदस्यता पर भी संकट आ सकता है। वहीं, दूसरी ओर प्रशासन की ‘निष्क्रियता’ पर उठते सवाल सरकार की पारदर्शिता की छवि को प्रभावित कर रहे हैं।
अब सबकी निगाहें 29 दिसंबर की सुनवाई पर टिकी हैं। क्या प्रशासन दबाव में झुकेगा या तथ्यों के आधार पर कड़ा फैसला लेगा?




