विशेष रिपोर्ट : रसूख के ‘किले’ में कानून की सेंध; बलरामपुर में पूर्व विधायक का अवैध कब्जा ढहा…

बलरामपुर-रामानुजगंज। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में भ्रष्टाचार और राजनीतिक रसूख के उस गठजोड़ का पर्दाफाश हुआ है, जिसने छह साल तक कानून को अपनी मुट्ठी में बांध रखा था। ग्राम मानपुर (तहसील शंकरगढ़) में शासकीय गोचर भूमि पर पूर्व विधायक द्वारा किए गए अवैध कब्जे का ‘तिलिस्म’ आखिरकार टूट गया है। अपर कलेक्टर न्यायालय, राजपुर ने 12 दिसंबर 2025 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अवैध पट्टे को निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन पर निजी स्वामित्व का दावा पूरी तरह निराधार है।
सेटलमेंट रिकॉर्ड ने खोली पोल: 1944 की सच्चाई बनाम 2019 का खेल : मामले की जड़ें ग्राम मानपुर के खसरा नंबर 228/5 (रकबा 0.372 हेक्टेयर) से जुड़ी हैं। राजस्व विभाग के रिकॉर्ड्स की पड़ताल में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
- ऐतिहासिक सच : सरगुजा सेटलमेंट 1944-45 के मुताबिक यह जमीन स्पष्ट रूप से ‘शासकीय गोचर’ दर्ज है।
- फर्जीवाड़ा : वर्ष 2019 में राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर राजस्व अभिलेखों में हेरफेर की गई और इस चरागाह को निजी पट्टा दर्शाकर कब्जा कर लिया गया।
- गायब दस्तावेज : जांच में पाया गया कि जिस 1990-91 के नामांतरण का हवाला दिया जा रहा था, उसकी न तो मूल प्रति उपलब्ध थी और न ही 1954-55 के बाद के कोई पुख्ता तहसील रिकॉर्ड।
राजस्व विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल : यह मामला केवल एक अवैध कब्जे का नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की संदिग्ध कार्यप्रणाली का भी एक्स-रे है। सवाल उठता है कि जब जमीन गोचर मद में दर्ज थी, तो वर्षों तक अधिकारी इसे ‘निजी भूमि’ क्यों बताते रहे? क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही थी या रसूखदार के आगे नतमस्तक होने की मजबूरी? राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट ने अंततः स्वीकार किया कि इस भूमि पर वैध पट्टा जारी होने का कोई प्रमाण नहीं है।
अपर कलेक्टर का फैसला : सिस्टम पर करारा तमाचा – अपर कलेक्टर न्यायालय ने अपने आदेश में न केवल पट्टा निरस्त किया, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड में तत्काल सुधार के निर्देश भी दिए। कोर्ट के इस सख्त रुख ने उन अधिकारियों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है जिन्होंने शिकायतकर्ताओं को वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर कटवाए।
“आम आदमी के लिए बेदखली और खास के लिए फाइल दबाने की नीति अब नहीं चलेगी। यह फैसला कानून के राज की जीत है।” — एक स्थानीय ग्रामीण
अनसुलझे सवाल : क्या सिर्फ पट्टा निरस्त होना काफी है? – फैसला आने के बाद अब जनता के बीच कुछ तीखे सवाल तैर रहे हैं:
- उन अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई कब होगी जिन्होंने गलत रिपोर्ट पेश कर गोचर को निजी बताया?
- 6 वर्षों तक शासकीय भूमि के उपयोग और वहां किए गए कच्चे निर्माण की जवाबदेही कौन लेगा?
- क्या जिले के अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह ‘राजनीतिक संरक्षण’ में दबी गोचर भूमियों का ऑडिट होगा?
बलरामपुर का यह मामला एक नजीर है कि यदि शासन और प्रशासन दबाव से मुक्त होकर काम करें, तो सत्य की जीत सुनिश्चित है। हालांकि, सिस्टम पर जनता का भरोसा तभी पूरी तरह बहाल होगा, जब फर्जीवाड़ा करने वाले चेहरों को बेनकाब कर उन्हें दंडित किया जाएगा।




