जशपुर कांड : नूतन सिदार की दबंगई पर पुलिस–प्रशासन बिका या डरा?…
• मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले का “लिफाफा तंत्र” जनता के गले की फांस...

जशपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले जशपुर से उठी यह चीख सिर्फ एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सड़ांध का सबूत है। जिला जनसम्पर्क कार्यालय के कर्मचारी रविन्द्रनाथ राम ने साफ-साफ आरोप लगाया है कि जनसम्पर्क अधिकारी नूतन सिदार ने उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी और गैरकानूनी काम करने को मजबूर किया। हालात इतने बदतर हुए कि 13 अगस्त की रात को वे आत्महत्या करने पर उतारू हो गए।
लेकिन जशपुर पुलिस और कलेक्टर ने अब तक आंख मूंद रखी है। सवाल उठता है – आखिर क्यों?…
नूतन सिदार : नाम से बड़ा असर, कानून बेअसर –
- लगातार जातिगत भेदभाव और अपमान।
- अनुचित निजी कामों का दबाव।
- रोज-रोज की डांट और धमकियों से मानसिक तोड़फोड़।
- और अब—आत्महत्या के लिए मजबूरी!
इसके बावजूद थाना प्रभारी जशपुर चुप हैं, SP और SDOP मौन साधे हैं, और कलेक्टर जशपुर तक बेशर्मी से मामले को दबा रहे हैं।
पुलिस की चुप्पी = “लिफाफा संस्कृति”
👉 थाना प्रभारी एफआईआर दर्ज करने से क्यों कतराते हैं?
👉 SP जशपुर और SDOP आखिर किस दबाव में मामले को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं?
👉 कलेक्टर जशपुर क्या नूतन सिदार की पैरवी में जुटे हैं?
क्या यह सबूत नहीं कि पूरा सिस्टम या तो बिक चुका है या डरा हुआ है?लेकिन सवाल उठता है आखिर किससे??….
जनता के सवाल अब आग बन चुके हैं :
- क्या मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के गृह जिले में नूतन सिदार ही कानून हैं?
- क्या पुलिस और कलेक्टर का “लिफाफा प्रेम” जनता की जान से बड़ा हो चुका है?
- जब सरकारी कर्मचारी ही आत्महत्या को मजबूर हों तो आम जनता कहाँ जाए?
सड़ा-गला तंत्र बेनकाब : यह घटना सिर्फ रविन्द्रनाथ राम की त्रासदी नहीं, बल्कि उस गलीज़ तंत्र का आईना है जहां नूतन सिदार जैसी अफसर बेखौफ अत्याचार करती हैं और पूरी मशीनरी उन्हें बचाती है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को अब जवाब देना होगा – क्या जशपुर में लोकतंत्र नहीं, बल्कि “लिफाफा तंत्र” चल रहा है?
क्या जनता को अब न्याय अदालत से नहीं, बल्कि आत्महत्या से मिलेगा?
🔥 यह खबर अब सिर्फ “मामला” नहीं, बल्कि जशपुर कांड बन चुका है।