रायगढ़-लैलूंगा के हुक्मरानों की हेकड़ी तोड़ेगा हाईकोर्ट : बाकारुमा मार्ग पर राजपुर के भूस्वामी की संपत्ति पर जबरन ‘कब्जा’, 5 साल तक आदेश दबाने वाले जिम्मेदार अफसरों पर लटकी अवमानना की तलवार!…

बिलासपुर। रायगढ़ जिले में प्रशासनिक अफसरों और लोक निर्माण विभाग (PWD) के गठजोड़ ने कानून, संविधान और न्यायपालिका के सम्मान को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। बाकारुमा–लैलूंगा मार्ग के नाम पर एक आम रैयत की निजी संपत्ति को हड़पने की ऐसी खुली साजिश चल रही है, जहां हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश भी जिले के हुक्मरानों के लिए महज रद्दी का टुकड़ा साबित हुआ।
अदालत द्वारा 2021 में दिए गए सख्त निर्देश को पूरे 5 साल तक दबाकर रखने और अपनी ही सरकारी रिपोर्ट में जमीन व 9 कमरों का मकान सड़क निर्माण में फंसा होने की पुष्टि के बावजूद फूटी कौड़ी मुआवजा न देने पर अब प्रशासन के पूरे तंत्र—कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार और पीडब्ल्यूडी—की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस प्रशासनिक मनमानी और खुली लूट के खिलाफ पीड़ित भूस्वामी राकेश कुमार बेहरा ने एक बार फिर बिलासपुर उच्च न्यायालय की शरण लेते हुए अवमाननाकारी व्यवस्था के खिलाफ रिट याचिका (W.P.(C)/2026) ठोक दी है।
तहसीलदार की सुस्ती या सोची-समझी साजिश? 5 साल में हुआ एक सीमांकन – मामला ग्राम राजपुर (तहसील लैलूंगा) के खसरा नंबर 380/6 का है। 25 मार्च 2021 को उच्च न्यायालय ने W.P.(C) No. 1827/2021 में साफ-साफ फैसला सुनाया था: “पहले जमीन की नाप-जोख करो, अगर सड़क में जमीन आती है तो वैधानिक भू-अधिग्रहण करो और मुआवजा दो; जबरन किसी की जमीन पर पैर नहीं रखा जाएगा।”
मगर लैलूंगा तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली देखिए – जिस सीमांकन में 15 दिन लगने चाहिए थे, उसे पूरा करने में राजस्व अमले को पूरे 5 साल लग गए। 2021 के आदेश पर तहसीलदार और पटवारियों की कलम 11 जुलाई 2026 को जाकर चली। यह पांच साल की देरी महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिक को थकाकर उसकी जमीन पर जबरन कब्जा कराने की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा नजर आती है।
खुद की रिपोर्ट ने उतारी कलई : 9 कमरों का पक्का ढांचा सड़क की भेंट चढ़ा –11 जुलाई 2026 को राजस्व अमले ने जब आखिरकार सीमांकन किया, तो अफसरों के सारे झूठे दावों की पोल खुल गई। सरकारी पंचनामे में दर्ज हुआ:
- 0.132 हेक्टेयर (लगभग 33 डिसमिल) निजी जमीन सीधे तौर पर सड़क की जद में आ चुकी है।
- सड़क निर्माण से पहले से मौजूद 99 वर्ग मीटर में बना 9 कमरों का पक्का ढांचा (लेबर क्वार्टर/मकान) पूरी तरह ध्वस्त होने की कगार पर है।
जब रिपोर्ट में खुद सरकारी बाबू लिख चुके हैं कि रैयत की जमीन और मकान सड़क परियोजना में आ रहे हैं, तो फिर फाइल पर कुंडली मारकर कौन बैठा है?
एसडीएम और भू-अधिग्रहण अधिकारी की चुप्पी : 7 अगस्त का आवेदन रद्दी की टोकरी में – सरकारी सीमांकन में पोल खुलने के बाद पीड़ित ने 7 अगस्त 2026 को अनुविभागीय अधिकारी (SDO) सह भू-अधिग्रहण अधिकारी, लैलूंगा के दफ्तर में विधिवत अर्जी दी कि जब जमीन और मकान प्रभावित हो चुके हैं, तो मुआवजा तय कर भुगतान किया जाए।
हैरानी की बात यह है कि भू-अधिग्रहण कानून के तहत त्वरित कदम उठाने के बजाय एसडीएम कार्यालय में यह फाइल दबा दी गई। न अवार्ड पारित हुआ, न धारा-11 की कोई कार्रवाई आगे बढ़ी, और न ही मुआवजे की फूटी कौड़ी जारी हुई। सवाल उठता है कि जब जमीन सरकारी प्रोजेक्ट में जा रही है, तो क्या अफसर इसे अपनी रियासत समझकर हड़पना चाहते हैं?
पीडब्ल्यूडी का रवैया: बिना अधिग्रहण जमीन पर कब्जा जमाने की तैयारी – लोक निर्माण विभाग (PWD) के इंजीनियर और ठेकेदार बिना एक धेला मुआवजा दिए सीधे बुलडोजर उतारने पर आमादा हैं। कानूनन जब तक धारा 300-ए के तहत भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती और विस्थापित को क्षतिपूर्ति नहीं मिलती, तब तक निजी संपत्ति पर एक गिट्टी भी नहीं डाली जा सकती। लेकिन बाकारुमा–लैलूंगा मार्ग पर सरकारी तंत्र पूरी तरह मनमानी पर उतर आया है।
कलेक्टर की निगरानी शून्य, अब हाईकोर्ट में नपेंगे जिम्मेदार – जिले के मुखिया होने के नाते कलेक्टर रायगढ़ का दायित्व था कि हाईकोर्ट के 2021 के आदेश का पालन समय पर सुनिश्चित कराते। मगर कलेक्टर से लेकर निचले पटवारी तक, पूरे तंत्र की साठगांठ ने एक नागरिक को 5 साल तक दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया।
अब पीड़ित ने उच्च न्यायालय के समक्ष अंतरिम स्थगन (Stay) की अर्जी लगाते हुए मांग की है:
- बाकारुमा–लैलूंगा मार्ग पर प्रभावित 0.132 हेक्टेयर भूमि और 9 कमरों के मकान पर तत्काल यथास्थिति (Status Quo) बहाल की जाए और काम रोका जाए।
- जब तक 2021 के अदालती आदेशानुसार अधिग्रहण पूरा कर ब्याज सहित वैधानिक मुआवजा नहीं दिया जाता, तब तक प्रशासन के किसी भी कदम पर रोक लगाई जाए।
- आदेश को 5 साल तक दबाकर रखने वाले दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान अब राजस्व और पीडब्ल्यूडी के अफसरों को यह जवाब देना भारी पड़ेगा कि 5 साल तक उन्होंने अदालत के आदेश को किस कानून के तहत ठंडे बस्ते में डाल रखा था।




