बिलासपुर में शर्मसार शिक्षा व्यवस्था : 10 महीने से वेतन नहीं तो स्कूल में छलकाया जाम? नशे में धुत पहुंचे प्रधान पाठक, वायरल वीडियो से हड़कंप…

- कोटा के बहेरामुड़ा स्कूल का मामला: पियक्कड़ ‘गुरुजी’ ने वेतन विवाद को बनाया ढाल; सवाल – अफसरों की लापरवाही का खामियाजा मासूम बच्चे क्यों भुगतें?…
बिलासपुर। विद्या के मंदिर को मयखाना समझने और मासूमों के भविष्य को दांव पर लगाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। कोटा विकासखंड के बहेरामुड़ा स्थित शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब स्कूल की कमान संभालने वाले प्रधान पाठक कथित तौर पर शराब के भारी नशे में लड़खड़ाते हुए स्कूल पहुंच गए। जब ग्रामीणों और जागरूक लोगों ने इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत पर सवाल दागे, तो गुरुजी ने शर्मिंदा होने के बजाय सारा दोष सिस्टम पर मढ़ दिया और बेबाकी से बोले – “10 महीने से वेतन नहीं मिला है, तो क्या करें!”
वायरल वीडियो ने न केवल गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा को तार-तार किया है, बल्कि जिले के शिक्षा विभाग के सुस्त निगरानी तंत्र की भी कलई खोलकर रख दी है।
सिस्टम की लाचारी या शिक्षक की खुली मनमानी? – वेतन न मिलना एक गंभीर प्रशासनिक विफलता हो सकती है, लेकिन क्या इसका इलाज शराब की बोतल में ढूंढकर क्लासरूम में बैठना है? जिस स्कूल की दहलीज पर बच्चे संस्कार, अनुशासन और जीवन के मूल्य सीखने आते हैं, वहीं अगर संस्था का मुखिया ही नशे में धुत मिले, तो इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।
शिक्षक का यह तर्क गले नहीं उतरता कि वेतन न मिलने की भरपाई स्कूल में नशेबाजी से की जाएगी। सवाल उठता है कि अगर समस्या थी, तो आंदोलन, पत्राचार या कानूनी रास्ते के बजाय बच्चों की पढ़ाई को बंधक क्यों बनाया गया?
निगरानी तंत्र पर 4 सीधे और तीखे सवाल:
- क्या कागजों पर ही दौड़ रहे हैं जिम्मेदार अफसर? विकासखंड और संकुल स्तर पर स्कूलों के नियमित औचक निरीक्षण का दावा करने वाले अधिकारी अब तक कहां थे? क्या यह स्थिति पहली बार बनी या महीनों से चल रहे इस ढर्रे पर जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे थे?
- 10 महीने से वेतन अटकाने का गुनहगार कौन? यदि शिक्षक का दावा सच है कि उन्हें 10 महीने से पगार नहीं मिली, तो यह शिक्षा विभाग की घोर संवेदनहीनता है। क्या विभाग किसी अनहोनी या ऐसे ही तमाशे का इंतजार कर रहा था?
- मासूमों की सुरक्षा और पढ़ाई का क्या? नशे में धुत शिक्षक के भरोसे ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को छोड़ देना उनके मानसिक और शारीरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। इस दौरान यदि कोई अप्रिय घटना घटती, तो जवाबदेही किसकी होती?
- कार्रवाई होगी या लीपापोती की फाइल बनेगी? अक्सर ऐसे मामलों में ‘जांच टीम’ गठित कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। क्या इस बार त्वरित निलंबन और कठोर विभागीय कार्रवाई की नजीर पेश की जाएगी?
बच्चों के भविष्य से बड़ा कोई विवाद नहीं – वेतन की समस्या और नशे की हालत – ये दोनों अलग-अलग पहलू हैं और दोनों पर ही कड़ी कार्रवाई की दरकार है। अगर शिक्षक की व्यथा जायज है, तो जिम्मेदार क्लर्क और अफसरों पर गाज गिरनी चाहिए जिन्होंने महीनों तक वेतन लटकाए रखा। लेकिन स्कूल परिसर में शराबखोरी को किसी भी परिस्थिति में ‘मजबूरी’ का चोला नहीं पहनाया जा सकता।
बिलासपुर का यह वायरल वीडियो सिर्फ एक स्कूल का सच नहीं, बल्कि ग्रामीण अंचलों की लचर सरकारी शिक्षा प्रणाली का आइना है। अब नजरें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या इस बार केवल पियक्कड़ प्रधान पाठक नपेंगे या उन लापरवाह अफसरों की कुर्सी भी हिलेगी, जिनकी अनदेखी ने इस नौबत को जन्म दिया।




